सहकारी समिति चुनाव विवादों में सीधे हाईकोर्ट नहीं जा सकते, पहले वैधानिक उपाय अपनाना होगा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सहकारी समितियों के चुनाव से जुड़े विवादों पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि जब कानून में विवाद के निपटारे के लिए अलग से प्रभावी वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध हो, तब ऐसे मामलों में सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सहकारी समिति के चुनाव से जुड़े विवादों का समाधान छत्तीसगढ़ सहकारी समितियां अधिनियम, 1960 की धारा 64(2)(v) के तहत संबंधित रजिस्ट्रार के समक्ष ही किया जाना चाहिए।

यह आदेश न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने हितेश चंद्राकर एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य (WPC No. 4222/2022, 2026:CGHC:34475) मामले में पारित किया।

मामले में याचिकाकर्ताओं ने महासमुंद जिला लघु वनोपज सहकारी संघ के चुनाव को चुनौती देते हुए चुनाव परिणाम रद्द करने और नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की थी। उनका आरोप था कि कई पात्र मतदाताओं और संभावित उम्मीदवारों को मतदान करने से वंचित कर दिया गया, जिससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हुई। वैकल्पिक रूप से उन्होंने उन मतदाताओं को मतदान का अवसर देकर मतों की पुनर्गणना कराने की भी मांग की थी।

सुनवाई के दौरान राज्य, सहकारी निर्वाचन आयोग और अन्य प्रतिवादियों ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 64(2)(v) चुनाव संबंधी विवादों के समाधान के लिए विशेष मंच उपलब्ध कराती है। इसलिए हाईकोर्ट को सीधे रिट याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए।

कोर्ट ने इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए कहा कि कानून स्पष्ट रूप से चुनाव संबंधी विवादों के निपटारे का अधिकार संबंधित रजिस्ट्रार को देता है। ऐसे मामलों में तथ्यात्मक विवाद भी शामिल होते हैं, जिनकी जांच और निर्णय रिट अधिकार क्षेत्र में नहीं बल्कि वैधानिक प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Ram Chandra Choudhary v. Roop Nagar Dugdh Utpadak Sahakari Samiti Ltd. (2026 SCC OnLine SC 583) तथा Meenakshi Natarajan v. Election Commission of India (2026 SCC OnLine SC 1133) का हवाला देते हुए कहा कि जहां प्रभावी वैधानिक उपचार उपलब्ध हो, वहां चुनावी विवादों में हाईकोर्ट को सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने दोहराया कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विवादों का समाधान उसी विशेष मंच के माध्यम से होना चाहिए जिसे कानून ने निर्धारित किया है।

कोर्ट ने कहा, “जब कानून चुनाव को चुनौती देने के लिए उपयुक्त वैधानिक उपाय उपलब्ध कराता है, तब अनुच्छेद 226 के तहत चुनाव विवाद उठाना उचित नहीं होगा।”

हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए उन्हें धारा 64(2)(v) के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी। साथ ही निर्देश दिया कि वर्ष 2022 से हाईकोर्ट में लंबित रहने की अवधि को सीमा अवधि (Limitation) या अन्य प्रक्रियात्मक पहलुओं पर विचार करते समय ध्यान में रखा जाए। न्यायालय ने संबंधित प्राधिकारी से मामले का शीघ्र निस्तारण करने की भी अपेक्षा व्यक्त की।

यह निर्णय सहकारी समितियों के चुनाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि चुनाव संबंधी विवादों में सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बजाय पहले अधिनियम में उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाना अनिवार्य है। इससे चुनावी विवादों के निपटारे की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी और विशेष प्राधिकारियों की भूमिका भी स्पष्ट होगी।