मध्यस्थता ही विवाद समाधान का भविष्य, पक्षकारों को अपने समाधान का अधिकार देती है: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

Supreme Court of India

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि मध्यस्थता (मेडिएशन) भविष्य की न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनने जा रही है क्योंकि यह विवादों के समाधान में पक्षकारों को स्वयं निर्णय लेने का अवसर देती है। उन्होंने कहा कि सहमति आधारित समाधान न केवल लंबे समय तक टिकाऊ होते हैं, बल्कि रिश्तों को भी सुरक्षित रखते हैं और न्याय तक आसान एवं सम्मानजनक पहुंच सुनिश्चित करते हैं।

सीजेआई सूर्यकांत ने “पीस, मेडिएशन एंड द रूल ऑफ लॉ” विषय पर आयोजित कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस में मुख्य वक्तव्य देते हुए कहा कि भारत और कॉमनवेल्थ देशों की न्याय व्यवस्था में मध्यस्थता को विवाद समाधान की केंद्रीय व्यवस्था के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। सम्मेलन में न्यायाधीशों, विधि विशेषज्ञों, मध्यस्थों, अधिवक्ताओं और नीति-निर्माताओं ने न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने में मध्यस्थता की भूमिका पर चर्चा की।

अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने प्रसिद्ध “ऑरेंज क्वॉरल” (संतरे के विवाद) की कहानी से की। उन्होंने बताया कि यदि दो बहनों के बीच एक संतरे को लेकर हुए विवाद में यह समझने का प्रयास किया जाता कि दोनों को संतरा क्यों चाहिए, तो दोनों की वास्तविक आवश्यकताएं पूरी हो सकती थीं। उनके अनुसार, यही मध्यस्थता का मूल सिद्धांत है कि केवल कानूनी दावों पर नहीं, बल्कि विवाद के पीछे छिपे वास्तविक हितों और उद्देश्यों को समझा जाए।

सीजेआई ने कहा कि विवाद के पीछे छिपे वास्तविक कारणों को समझने की यह सोच भारत की प्राचीन सभ्यता और न्याय परंपरा का हिस्सा रही है। उन्होंने भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध से पहले शांति दूत के रूप में हस्तिनापुर जाकर सुलह का प्रयास किया था। उन्होंने कहा कि यह दर्शाता है कि भारत की परंपरा में युद्ध से पहले संवाद और समझौते को सर्वोच्च महत्व दिया गया।

उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी उल्लेख किया और कहा कि कूटनीति के चार उपायों में सबसे पहले साम (Conciliation) को स्थान दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की न्यायिक और राजनीतिक परंपरा में शांतिपूर्ण समझौता सदैव महत्वपूर्ण रहा है।

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मेडिएशन अधिनियम, 2023 ने पहली बार स्वैच्छिक मध्यस्थता, न्यायालय से संबद्ध मध्यस्थता और सामुदायिक मध्यस्थता के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया है। उनके अनुसार, यह कानून भारत में मध्यस्थता को संस्थागत रूप देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के एम.आर. कृष्णमूर्ति बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड तथा मोती राम बनाम अशोक कुमार जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिनमें मोटर दुर्घटना, बीमा और वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता को प्रोत्साहित किया गया था। उन्होंने कहा कि इन सभी निर्णयों का मूल उद्देश्य विधि के शासन (Rule of Law) को अधिक प्रभावी बनाना था।

सीजेआई ने कहा कि विधि का शासन केवल प्रत्येक विवाद का न्यायालय में निर्णय कराने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को समय पर, सुलभ और सम्मानजनक न्याय उपलब्ध कराना है।

उन्होंने कहा कि मध्यस्थता पारंपरिक मुकदमेबाजी और पंचाट (आर्बिट्रेशन) से अलग है। जहां पंचाट में सामान्यतः एक पक्ष विजेता और दूसरा पराजित होता है तथा मुकदमेबाजी का उद्देश्य न्यायिक मिसाल विकसित करना होता है, वहीं मध्यस्थता में पक्षकार स्वयं समाधान तैयार करते हैं। इससे न केवल संबंधों के बने रहने की संभावना बढ़ती है बल्कि समझौते के पालन की संभावना भी अधिक रहती है।

इस अवसर पर सीजेआई ने घोषणा की कि सर्वोच्च न्यायालय 21 से 23 अगस्त तक “समाधान समारोह” नामक विशेष लोक अदालत का आयोजन करेगा। इसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों का सहमति के आधार पर निस्तारण करना है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इससे अनेक विवाद प्रतिस्पर्धा के बजाय आपसी सहमति से अंतिम रूप से समाप्त हो सकेंगे।

अपने संबोधन के अंत में सीजेआई सूर्यकांत ने सम्मेलन के आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे मंच भारत की प्राचीन न्याय परंपरा और आधुनिक न्यायिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मध्यस्थता की यह परंपरा नई पीढ़ी के माध्यम से आगे बढ़ेगी और न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय, प्रभावी तथा सुलभ बनाएगी।