छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीजी शिक्षक पात्रता परीक्षा (CG TET)-2024 की अंतिम उत्तर कुंजी (Final Answer Key) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि परीक्षा और मूल्यांकन जैसे शैक्षणिक मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप अत्यंत सीमित है। कोर्ट ने कहा कि विषय विशेषज्ञों की समिति द्वारा लिए गए निर्णय को केवल इसलिए नहीं बदला जा सकता क्योंकि किसी अन्य दृष्टिकोण की संभावना मौजूद है। जब तक निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विरुद्ध साबित न हो, तब तक न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने Likesh Singh Bhardwaj एवं अन्य बनाम राज्य शासन एवं अन्य (WPC No. 5237/2024, 2026:CGHC:34378) में यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने सीजी टीईटी-2024 (अपर प्राइमरी) की अंतिम उत्तर कुंजी में सेट-A के प्रश्न क्रमांक 56, सेट-B के प्रश्न क्रमांक 55 तथा सेट-C एवं D के प्रश्न क्रमांक 57 को हटाए जाने को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि इन प्रश्नों को परीक्षा निर्देशों के विपरीत रद्द किया गया, जिससे उनके अंक घट गए और वे निर्धारित न्यूनतम 75 अंक हासिल नहीं कर सके।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि परीक्षा निर्देशों के क्लॉज-12 के अनुसार किसी प्रश्न को केवल तभी हटाया जा सकता है जब प्रश्न में संरचनात्मक त्रुटि हो, कोई भी विकल्प सही न हो, हिंदी और अंग्रेजी संस्करण में गंभीर अंतर हो या मुद्रण त्रुटि के कारण सही उत्तर निर्धारित करना संभव न हो। उनका दावा था कि विवादित प्रश्न इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं आता था, इसलिए उसे हटाने के बजाय उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए था।
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (CG VYAPAM) ने अदालत को बताया कि संबंधित प्रश्न एक समान गद्यांश पर आधारित थे। कुछ प्रश्न पुस्तिकाओं में मुद्रण और क्रम संबंधी त्रुटि के कारण गद्यांश बाद में छपा था, जबकि उससे जुड़े प्रश्न पहले दिए गए थे। इससे अभ्यर्थियों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। उम्मीदवारों की आपत्तियों पर विषय विशेषज्ञ समिति ने विचार किया और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सभी सेटों में ऐसे प्रश्न हटाने की सिफारिश की, जिसे बोर्ड ने समान रूप से लागू किया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद माना कि प्रश्न हटाने का निर्णय बिना आधार के नहीं लिया गया था, बल्कि विशेषज्ञ समिति की राय पर आधारित था। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि विशेषज्ञ समिति की राय दुर्भावनापूर्ण, मनमानी या किसी वैधानिक प्रावधान के विपरीत थी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि “अदालतें विषय विशेषज्ञों के स्थान पर अपना मत नहीं रख सकतीं। यदि दो संभावित दृष्टिकोण हों, तो सामान्यतः अंतिम शैक्षणिक प्राधिकारी द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण ही स्वीकार किया जाएगा।”
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के Ran Vijay Singh v. State of Uttar Pradesh (2018) सहित कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि उत्तर कुंजी, मूल्यांकन और परीक्षा संबंधी मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है। केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष त्रुटि होने पर ही न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रारंभिक (Provisional) उत्तर कुंजी के आधार पर किसी अभ्यर्थी को कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। अंतिम परिणाम हमेशा विशेषज्ञों द्वारा आपत्तियों पर विचार करने के बाद जारी की गई अंतिम उत्तर कुंजी के आधार पर ही तैयार किया जाता है। इसलिए केवल इस आधार पर कि प्रारंभिक उत्तर कुंजी में याचिकाकर्ता उत्तीर्ण हो रहे थे, अंतिम उत्तर कुंजी को बदलने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि परीक्षा मंडल की प्रक्रिया पारदर्शी, समान और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर आधारित थी। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। परिणामस्वरूप न्यायालय ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।
