छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिजली चोरी के एक महत्वपूर्ण मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपी को दोषी ठहराया है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने कहा कि बिजली विभाग के अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए निरीक्षण प्रतिवेदन और पंचनामा को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि मामले में कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ऐसे आधिकारिक दस्तावेजों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से गलत साबित न किया जाए, तब तक उनकी सत्यता के पक्ष में विधिक अनुमान लगाया जाएगा।
यह मामला छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें जनजगीर-चांपा स्थित विशेष न्यायालय (विद्युत अधिनियम) के 3 नवंबर 2016 के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी, जिसके माध्यम से दिनेश चंद्र को विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 के तहत बिजली चोरी के आरोप से बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के प्रावधानों का सही मूल्यांकन नहीं किया तथा उसके निष्कर्ष विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण और विकृत (perverse) थे।

मामले के अनुसार 10 मार्च 2014 को बिजली विभाग की सतर्कता टीम ने आरोपी के घर का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि आरोपी का विद्युत कनेक्शन बकाया बिलों के कारण पहले ही काटा जा चुका था, लेकिन इसके बावजूद उसने लो टेंशन लाइन से सीधे तार जोड़कर बिजली का अवैध उपयोग किया। टीम ने घर में पंखा, कूलर, टीवी, पानी की मोटर, बल्ब और सीएफएल बल्ब चलते हुए पाए। विभाग ने मौके पर पंचनामा, निरीक्षण प्रतिवेदन, जब्ती मेमो और अन्य दस्तावेज तैयार किए तथा लगभग 43,623 रुपये की देयता का आकलन किया। इसके बाद विद्युत अधिनियम की धारा 135 के तहत आपराधिक शिकायत दायर की गई।
ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के मामले को संदेहास्पद मानते हुए यह कहा था कि विभाग ने कोई स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत नहीं किया, न ही यह साबित किया कि आरोपी संपत्ति का मालिक या कब्जाधारी था। अदालत ने यह भी माना था कि विद्युत अधिनियम और संबंधित नियमों के कुछ अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। इन कारणों से आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने अपील की सुनवाई के दौरान इन निष्कर्षों को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बिजली विभाग के अधिकारी अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए निरीक्षण करते हैं और उनके द्वारा तैयार किए गए दस्तावेजों को केवल स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति के आधार पर अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा, “बिजली बोर्ड के अधिकारियों द्वारा तैयार की गई निरीक्षण रिपोर्ट उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किया गया कार्य है और जब तक इसके विपरीत ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएं, उसकी वैधता और सत्यता के पक्ष में अनुमान लगाया जाएगा।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि निरीक्षण के समय आरोपी की पत्नी मौके पर मौजूद थीं और उन्होंने पंचनामा, निरीक्षण प्रतिवेदन तथा अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे। आरोपी ने भी अपने बयान में यह स्वीकार किया था कि निरीक्षण के समय उसकी पत्नी घर पर मौजूद थीं। इसके बावजूद आरोपी ने न तो कोई प्रतिरक्षा साक्ष्य प्रस्तुत किया और न ही निरीक्षण रिपोर्ट को गलत साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर लाई।
निर्णय में हाईकोर्ट ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 और धारा 135 के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि धारा 126 अनधिकृत बिजली उपयोग के मामलों में आकलन और वसूली से संबंधित है, जबकि धारा 135 बिजली चोरी जैसे आपराधिक अपराधों से संबंधित दंडात्मक प्रावधान है। इसलिए यदि आकलन संबंधी नियमों के पालन में कोई कमी भी मान ली जाए, तो उससे बिजली चोरी के आपराधिक अभियोजन पर स्वतः प्रभाव नहीं पड़ता। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दोनों प्रावधानों को मिलाकर गलत निष्कर्ष निकाला।
संपत्ति के स्वामित्व संबंधी प्रश्न पर भी हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की आलोचना की। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति के नाम पर बिजली कनेक्शन जारी हुआ हो, जिसका सेवा क्रमांक विभागीय अभिलेखों में दर्ज हो और जिसके खिलाफ बकाया बिलों के कारण डिस्कनेक्शन नोटिस जारी किया गया हो, उसे विद्युत अधिनियम के तहत उपभोक्ता माना जाएगा। ऐसे मामलों में राजस्व अभिलेख प्रस्तुत कर स्वामित्व सिद्ध करना आवश्यक नहीं है, विशेषकर जब विवाद संपत्ति के शीर्षक से संबंधित न हो।
अपीलीय अदालत ने यह भी दोहराया कि यद्यपि बरी करने के आदेश में हस्तक्षेप सामान्यतः सीमित परिस्थितियों में किया जाता है, लेकिन जहां ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की हो, कानून का गलत प्रयोग किया हो और उसके निष्कर्ष स्पष्ट रूप से विकृत हों, वहां उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने का अधिकार है। अदालत ने पाया कि इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य केवल आरोपी की दोषसिद्धि की ओर संकेत करते हैं और दो संभावित दृष्टिकोणों की स्थिति मौजूद नहीं है।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला फैसला रद्द कर दिया और आरोपी को विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने सजा की मात्रा तय करने के लिए मामले को अलग से सूचीबद्ध करते हुए पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने का निर्देश दिया। यह निर्णय बिजली चोरी के मामलों में जांच अधिकारियों की रिपोर्टों के महत्व, आधिकारिक दस्तावेजों की साक्ष्यात्मक वैधता और विद्युत अधिनियम के दंडात्मक प्रावधानों की न्यायिक व्याख्या के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
