छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग 23 वर्ष पुराने एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चार आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के आरोप से बरी कर दिया है। हालांकि अदालत ने पाया कि पीड़ितों को गंभीर चोटें पहुंचाई गई थीं, इसलिए आरोपियों को धारा 326 और 326/34 के तहत दोषी ठहराया गया। साथ ही, लंबे समय के अंतराल, पक्षकारों के बीच समझौते और आरोपियों के आपराधिक रिकॉर्ड के अभाव को देखते हुए उनकी सजा घटाकर चार माह का कठोर कारावास कर दी गई।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने यह फैसला आपराधिक अपील क्रमांक 204/2005 में सुनाया। यह अपील रायगढ़ की फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा 1 मार्च 2005 को पारित उस निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें आरोपियों गुरु प्रसाद पटेल, तोषराम पटेल, टेकराम पटेल और संतोष पटेल को हत्या के प्रयास सहित विभिन्न अपराधों में दोषी ठहराकर सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मामले की शुरुआत दिसंबर 2003 में हुई थी। अभियोजन के अनुसार धान बिक्री के भुगतान और दर को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद चल रहा था। विवाद के समाधान के लिए गांव में पंचायत बुलाई गई थी। इसी दौरान आरोपियों और शिकायतकर्ता पक्ष के बीच झड़प हो गई। अभियोजन का आरोप था कि तोषराम पटेल ने टंगिया से हमला किया जबकि अन्य आरोपियों ने लाठियों से मारपीट की। घटना में उपेंद्र कुमार और टेकराम उर्फ पूरन को गंभीर चोटें आईं, जबकि जीतराम और बालमुकुंद को साधारण चोटें लगीं।
मेडिकल साक्ष्यों के अनुसार उपेंद्र कुमार के हाथ की अल्ना हड्डी में फ्रैक्चर पाया गया, जबकि टेकराम के सिर की पैराइटल बोन में हेयरलाइन फ्रैक्चर था। डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया कि चोटें गंभीर अवश्य थीं, लेकिन उन्होंने यह राय नहीं दी कि वे मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त थीं। अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि चिकित्सकीय साक्ष्य हत्या के प्रयास के आरोप का समर्थन नहीं करते थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 307 आईपीसी के लिए केवल चोट लगना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह भी साबित करना होता है कि आरोपी के पास हत्या करने का स्पष्ट इरादा या आवश्यक आपराधिक मनोभाव (mens rea) था। अदालत ने पाया कि घटना अचानक हुई थी, पंचायत बुलाए जाने को लेकर तनाव उत्पन्न हुआ और रिकॉर्ड से पूर्व नियोजित हमला या हत्या की मंशा सिद्ध नहीं होती। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपियों ने ऐसी परिस्थितियों में हमला किया था, जिससे उनकी मंशा हत्या करने की प्रतीत हो।
फैसले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि “धारा 307 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक है कि अभियोजन हत्या करने के इरादे या ज्ञान को संदेह से परे साबित करे। केवल गंभीर चोट का होना पर्याप्त नहीं है।” अदालत ने यह भी कहा कि घटना के दौरान दोनों पक्षों के बीच अचानक झड़प और “फ्री फाइट” जैसी स्थिति सामने आई थी, जिससे हत्या की पूर्वनियोजित मंशा का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि चिकित्सा साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि आरोपियों द्वारा हमला किया गया था और दो पीड़ितों को फ्रैक्चर जैसी गंभीर चोटें पहुंची थीं। अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 320 के अनुसार हड्डी का फ्रैक्चर “गंभीर चोट” (grievous hurt) की श्रेणी में आता है। इसलिए आरोपियों को धारा 307 के बजाय धारा 326 के तहत दोषी ठहराया जाना उचित होगा।
फैसले के दौरान अदालत ने घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही को भी विश्वसनीय माना। न्यायालय ने कहा कि घायल गवाहों की उपस्थिति और घटना का प्रत्यक्ष अनुभव उनकी गवाही को विशेष महत्व प्रदान करता है और केवल मामूली विरोधाभासों के आधार पर ऐसे साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जा सकता।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि अपील लंबित रहने के दौरान पक्षकारों के बीच समझौता हो गया। पीड़ितों ने अदालत में हलफनामा प्रस्तुत कर बताया कि दोनों पक्षों के बीच अब सौहार्दपूर्ण संबंध हैं और विवाद समाप्त हो चुका है। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने धारा 325/34 और 323/34 आईपीसी से संबंधित अपराधों को समझौते के आधार पर कंपाउंड करने की अनुमति दे दी।
सजा के प्रश्न पर अदालत ने कई शमनकारी परिस्थितियों पर विचार किया। न्यायालय ने पाया कि घटना वर्ष 2003 की है, आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, वे लंबे समय से जमानत पर रहे और उन्होंने जमानत की शर्तों का कभी उल्लंघन नहीं किया। इसके अतिरिक्त पीड़ित और आरोपी अब समझौता कर चुके हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने धारा 326 और 326/34 के तहत प्रत्येक आरोपी को केवल चार माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई और पूर्व में जेल में बिताई गई अवधि का समायोजन (set-off) देने का निर्देश दिया।
यह फैसला धारा 307 आईपीसी और धारा 326 आईपीसी के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है। निर्णय बताता है कि गंभीर चोट और हत्या के प्रयास में महत्वपूर्ण अंतर आरोपी की मंशा और परिस्थितियों के मूल्यांकन पर निर्भर करता है। साथ ही यह निर्णय दर्शाता है कि लंबे समय से लंबित मामलों में समझौता, पुनर्स्थापनात्मक न्याय और शमनकारी परिस्थितियां सजा निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
