कॉलेजियम प्रणाली में बढ़ती गोपनीयता पर जस्टिस उज्जल भुइयां की चिंता, बोले: पारदर्शिता की कमी से न्यायपालिका पर घटेगा जनता का भरोसा

Justice Ujjal Bhuyan

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में बढ़ती गोपनीयता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नियुक्तियों और नामों को अस्वीकार करने के कारण सार्वजनिक न करने से न केवल योग्य न्यायाधीशों के साथ अन्याय होता है, बल्कि इससे ऐसे लोगों के उच्च न्यायपालिका में पहुंचने का खतरा भी बढ़ जाता है जिनके विचार संविधान के अनुरूप नहीं हैं।

शनिवार को विदि (Vidhi) की JALDI पहल द्वारा जारी रिपोर्ट “ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा सूचना प्रकटीकरण का आकलन” के विमोचन समारोह में मुख्य वक्तव्य देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल के दिनों में कॉलेजियम की ओर से जारी प्रस्तावों (रेजोल्यूशन) में नियुक्ति की सिफारिशों के पीछे कोई कारण दर्ज नहीं किया जा रहा है। उन्होंने इसे न्यायिक पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने वाला कदम बताया।

उन्होंने कहा कि पहले कॉलेजियम के प्रस्ताव संक्षिप्त अवश्य होते थे, लेकिन उनमें यह बताया जाता था कि किसी उम्मीदवार की सिफारिश क्यों की गई। जबकि हाल के तीन प्रस्ताव बिना किसी कारण के जारी किए गए हैं। जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में कारण ही नहीं बताए जाएंगे तो जनता न्यायपालिका की निष्पक्षता पर विश्वास कैसे करेगी।

योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय, अयोग्य लोगों के लिए खुल सकता है रास्ता

जस्टिस भुइयां ने कहा कि नियुक्तियों के कारणों को छिपाना वास्तव में उन योग्य न्यायाधीशों के साथ अन्याय है जो पदोन्नति के पात्र हैं। वहीं दूसरी ओर इससे ऐसे व्यक्तियों के चयन की संभावना भी बढ़ जाती है, जिनके सार्वजनिक विचार संविधान की मूल भावना के विपरीत हों।

उन्होंने 2024 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यक्रम में तत्कालीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा विभिन्न धार्मिक समुदायों की तुलना करते हुए दिए गए विवादित बयान का उल्लेख किया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियां संविधान की भावना के अनुरूप नहीं हैं और यह दर्शाती हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय उम्मीदवारों की संवैधानिक प्रतिबद्धता का गंभीर परीक्षण आवश्यक है।

सौरभ किरपाल के मामले का किया उल्लेख

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल के दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की सिफारिश का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम ने इस मामले में विस्तृत कारणों के साथ अपनी सिफारिश दोहराई थी, लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक उस पर निर्णय नहीं लिया है। उनके अनुसार, इस प्रकार के कारणयुक्त निर्णय जनता के विश्वास को मजबूत करते हैं और नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया पर सार्वजनिक चर्चा से नहीं डरना चाहिए

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली पर शोध करने वाले विद्वानों को स्वयं इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों और स्थानांतरण पर होने वाली चर्चाएं पूरी तरह गोपनीय रहती हैं, सिफारिशों को अस्वीकार या लंबित रखने के कारण शायद ही कभी सार्वजनिक किए जाते हैं और चयन के मानदंड भी किसी सार्वजनिक दस्तावेज में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि संवैधानिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति किस आधार पर की जाती है और किन लोगों को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाती है। उनके अनुसार न्यायिक नियुक्तियों पर सार्वजनिक विमर्श का स्वागत किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी पारदर्शिता की वकालत की

कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल और आदित्य सोंधी ने भी न्यायिक नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता का समर्थन किया।

सौरभ किरपाल ने कहा कि कॉलेजियम को उम्मीदवारों की सिफारिश करते समय केवल औपचारिक टिप्पणियां नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ और स्पष्ट कारण दर्ज करने चाहिए। इससे बार और आम जनता दोनों को यह समझने में मदद मिलेगी कि एक उम्मीदवार को दूसरे पर क्यों प्राथमिकता दी गई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की वैधता जनता के विश्वास से आती है, इसलिए पारदर्शिता न्यायिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा है।

वहीं आदित्य सोंधी ने कहा कि नियुक्तियों के कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए, लेकिन उम्मीदवारों की आय जैसी कुछ संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारियों को सार्वजनिक करना आवश्यक नहीं है, विशेषकर तब जब कोई अधिवक्ता विधिक सहायता या नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में कार्य करता हो।

उन्होंने केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय किसी नाम की दोबारा सिफारिश कर देता है, तो भी सरकार वर्षों तक उस पर निर्णय क्यों नहीं लेती।

जस्टिस उज्जल भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब न्यायपालिका की जवाबदेही, कॉलेजियम प्रणाली की कार्यप्रणाली और न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता को लेकर देशभर में व्यापक बहस चल रही है। उनके विचारों ने एक बार फिर न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक खुला, कारणयुक्त और जवाबदेह बनाने की मांग को बल दिया।