विरोध प्रदर्शनों के दौरान आवश्यक सेवाओं में बाधा पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Supreme Court of India

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन और धरना-प्रदर्शन के कारण सार्वजनिक सेवाओं में कथित व्यवधान, आम नागरिकों की आवाजाही में परेशानी और आवश्यक सेवाओं के प्रभावित होने से जुड़ी याचिका पर विचार करने की सहमति दी है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई। पीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विरोध प्रदर्शन स्थलों के नियमन से संबंधित लंबित मामले के साथ की जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वी. इलंचेलियन ने दलील दी कि विभिन्न स्थानों पर होने वाले विरोध प्रदर्शन अक्सर आवश्यक सेवाओं के संचालन को प्रभावित करते हैं और आम लोगों की आवाजाही को बाधित करते हैं। उन्होंने कहा कि यह समस्या किसी एक विरोध स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव सार्वजनिक सुविधा और आवश्यक सेवाओं की निरंतर उपलब्धता पर पड़ता है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका में मांगे गए निर्देशों की प्रकृति को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या अदालत याचिकाकर्ता द्वारा अपेक्षित व्यापक या सभी मामलों पर लागू होने वाले निर्देश जारी कर सकती है।

हालांकि, इन सवालों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया और इसे संबंधित लंबित कार्यवाही के साथ सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

यह याचिका आलोक मोहन बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) संख्या 959/2026 के रूप में दायर की गई है। याचिका 29 जुलाई 2026 को दाखिल की गई थी। इसमें प्रदर्शनों के कारण सार्वजनिक सुविधा, आम नागरिकों की आवाजाही और आवश्यक सेवाओं की निर्बाध उपलब्धता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है।

विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन

यह मामला शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और व्यापक जनहित के बीच संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ख) के तहत नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, अनुच्छेद 19(3) के तहत इस अधिकार पर सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

जब किसी विरोध प्रदर्शन के कारण सार्वजनिक सड़कों पर आवागमन बाधित होता है, आवश्यक सेवाएं प्रभावित होती हैं या आम नागरिकों को गंभीर कठिनाई का सामना करना पड़ता है, तब प्रशासन के लिए सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की सुविधा बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है।

साथ ही, विरोध प्रदर्शनों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध कानूनी आधार पर और अनुपातिक होने चाहिए, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध और असहमति व्यक्त करने के अधिकार पर अनावश्यक अंकुश न लगे।

विरोध स्थलों के नियमन पर भी होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका को संबंधित लंबित मामले के साथ जोड़कर सुनने का निर्णय विरोध प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक स्थानों के उपयोग और उनके नियमन के व्यापक प्रश्न को महत्वपूर्ण बनाता है।

अदालत के समक्ष यह प्रश्न भी सामने आ सकता है कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन को किस सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है, खासकर तब जब उससे सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, यातायात या आवश्यक सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।

मामले की आगे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, आम नागरिकों की आवाजाही और आवश्यक सेवाओं की निर्बाध उपलब्धता के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं पर विचार कर सकता है।