बिना सुनवाई 4.40 लाख रुपये की वसूली नहीं कर सकता विभाग, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ वित्तीय वसूली का आदेश जारी करने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस देना, उसका पक्ष सुनना और विधिसम्मत जांच करना अनिवार्य है। न्यायालय ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए राजनांदगांव जिले के एक सरकारी कॉलेज कर्मचारी के खिलाफ जारी 4.40 लाख रुपये से अधिक की वसूली का आदेश रद्द कर दिया।

मामला धनराज सिंह से जुड़ा है, जो वर्तमान में मोहला स्थित शासकीय कॉलेज में सहायक ग्रेड-3 के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले वे शासकीय लाल श्याम शाह महाविद्यालय, मानपुर में बुक लिफ्टर के रूप में पदस्थ थे। पदोन्नति के बाद उनका तबादला मोहला कर दिया गया था। स्थानांतरण के समय उन्हें विभाग की ओर से “नो ड्यूज सर्टिफिकेट” भी जारी किया गया था।

बाद में कॉलेज प्रशासन ने पुस्तकालय के भौतिक सत्यापन के दौरान 2,651 पुस्तकें गायब पाए जाने का दावा किया। इन पुस्तकों का मूल्य 4,40,193.60 रुपये आंका गया और जनवरी 2022 में धनराज सिंह के खिलाफ वसूली का आदेश जारी कर दिया गया। आदेश में यह भी कहा गया कि राशि की वसूली उनके वेतन से पांच वर्षों तक मासिक किश्तों में की जाएगी।

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH
JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनके स्थानांतरण के समय न तो पुस्तकालय का कोई भौतिक सत्यापन हुआ था और न ही किसी प्रकार की कमी का आरोप लगाया गया था। उन्हें विधिवत नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी किया गया था। इसके बावजूद कई महीने बाद उनके खिलाफ एकतरफा तरीके से वसूली का आदेश पारित कर दिया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि न तो उन्हें कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही विभागीय जांच की गई, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारी को पुस्तकालय का संपूर्ण प्रभार सौंपा गया था और बाद में गठित जांच समिति ने पुस्तकों की कमी पाई। सरकार ने यह भी कहा कि नो ड्यूज सर्टिफिकेट गलती से जारी हो गया था और कर्मचारी ने पुस्तकों का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया था।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने कहा कि यह निर्विवाद तथ्य है कि याचिकाकर्ता को स्थानांतरण के समय नो ड्यूज सर्टिफिकेट दिया गया था। न्यायालय ने माना कि यदि उस समय किसी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता सामने होती तो ऐसा प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि “जिस किसी आदेश के कारण किसी व्यक्ति पर नागरिक या वित्तीय प्रभाव पड़ता है, उससे पहले उचित जांच और सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि “किसी व्यक्ति को सुने बिना उसके खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत प्रशासनिक कार्यवाही का मूल आधार हैं। कारण बताओ नोटिस देना और प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान करना निष्पक्ष प्रशासन की अनिवार्य शर्त है।

अदालत ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने न तो याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया और न ही कोई नियमित विभागीय जांच कराई। ऐसे में सीधे वसूली का आदेश जारी करना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि विभाग को पहले कर्मचारी से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था, उसके जवाब पर विचार करना चाहिए था और आवश्यकता पड़ने पर सुनवाई के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने 21 जनवरी 2022 के वसूली आदेश को “कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण” बताते हुए निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने विभाग को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह कानून के अनुसार नई कार्यवाही शुरू कर सकता है। इसके लिए विभाग को पहले नोटिस जारी करना होगा, कर्मचारी का पक्ष सुनना होगा, आवश्यक जांच करनी होगी और उसके बाद ही कोई कारणयुक्त आदेश पारित किया जा सकेगा।

यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ की जाने वाली वसूली और अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को किसी भी कर्मचारी पर वित्तीय दायित्व डालने से पहले प्राकृतिक न्याय और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।