इलाहाबाद हाई कोर्ट ने न्यायालय को गुमराह करने और भूमि अधिग्रहण अवार्ड की कथित रूप से छेड़छाड़ की गई प्रति दाखिल करने के मामले में दो अधिवक्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि अधिवक्ताओं ने मूल अवार्ड में मौजूद नहीं रहे ब्याज की दरों को जोड़कर न्यायालय से अपने मुवक्किलों के पक्ष में अधिक मुआवजा दिलाने का प्रयास किया।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने कहा कि अधिवक्ता शिवकांत मिश्रा और कृष्णकांत मिश्रा ने जानबूझकर अवार्ड की प्रति में बदलाव किया। अदालत ने इस कृत्य को न्यायिक प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी और गंभीर पेशेवर दुराचार माना।
मामला बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका से जुड़ा था। वर्ष 2024 में हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे पर पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत तथा उसके बाद 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। बीडीए ने पुनर्विचार याचिका में कहा कि वर्ष 2016 के मूल अवार्ड में केवल इतना उल्लेख था कि ब्याज “नियमों के अनुसार” देय होगा, जबकि भूमि स्वामियों की ओर से दाखिल टाइप की गई प्रति में 9 प्रतिशत और 15 प्रतिशत ब्याज की दरें जोड़ दी गई थीं। इसी आधार पर अदालत ने पहले अधिक ब्याज का आदेश पारित कर दिया था।
बीडीए ने बताया कि अवमानना कार्यवाही के दौरान राशि का भुगतान करने के बाद जब मूल अभिलेखों का मिलान किया गया, तब इस कथित हेरफेर का पता चला।
खंडपीठ ने अधिवक्ताओं की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि यह केवल टंकण त्रुटि थी। अदालत ने कहा कि मूल अवार्ड में मौजूद नहीं रही ब्याज की दरों को जोड़ना किसी भी प्रकार से साधारण भूल नहीं बल्कि न्यायालय को धोखा देने का सुनियोजित प्रयास था। अदालत ने यह भी कहा कि अधिवक्ताओं की ओर से मांगी गई माफी वास्तविक पश्चाताप नहीं बल्कि उनका आचरण उजागर होने के बाद की औपचारिक प्रतिक्रिया थी, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पेशेवर नैतिकता पर गंभीर टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि आम नागरिक न्याय पाने की आशा में अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं और अपने अधिवक्ताओं पर पूर्ण विश्वास करते हैं। ऐसे में यदि अधिवक्ता ही न्यायालय के समक्ष गलत दस्तावेज प्रस्तुत करें, तो यह न्याय व्यवस्था और अधिवक्ता पेशे दोनों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि संबंधित अधिवक्ताओं के विरुद्ध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू की जाए ताकि उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 199 के अंतर्गत झूठा साक्ष्य प्रस्तुत करने के आरोप में अभियोजन चलाया जा सके। साथ ही, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिल के समक्ष शिकायत दर्ज कर उनके अधिवक्ता लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई प्रारंभ करने का भी निर्देश दिया।
पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने अपने वर्ष 2024 के पूर्व निर्णय को वापस ले लिया। अदालत ने माना कि वह निर्णय धोखाधड़ी के आधार पर प्राप्त किया गया था। इसके साथ ही बरेली विकास प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि लाभार्थियों को अतिरिक्त रूप से दी गई राशि की वसूली भू-राजस्व बकाया के रूप में की जाए।
