दिल्ली हाईकोर्ट ने बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें सोशल मीडिया पर प्रसारित उन कथित फर्जी पोस्टों और ऑनलाइन सामग्री को हटाने की मांग की गई है, जिनमें दावा किया गया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीश और केंद्रीय मंत्री सरकारी खर्च पर बैडमिंटन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लंदन गए थे।
न्यायमूर्ति तेजस करिया की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत केंद्र सरकार के पास सोशल मीडिया मंचों और मध्यस्थों को आवश्यक निर्देश जारी करने की पर्याप्त शक्ति है। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेइटी) को शिकायत की जांच कर कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं और संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को लेकर एक मनगढ़ंत कथा गढ़ने के उद्देश्य से फैलाए गए हैं। उन्होंने कहा कि आधिकारिक स्पष्टीकरण और तथ्य-जांच के बावजूद यह भ्रामक सामग्री विभिन्न डिजिटल मंचों पर लगातार प्रसारित हो रही है।
याचिका के अनुसार, वायरल पोस्टों में दावा किया गया था कि सीजेआई सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू तथा अन्य न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी बैडमिंटन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लंदन गए थे।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर साझा की जा रही तस्वीरें वास्तव में नवंबर 2025 में नई दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय न्यायाधीश बैडमिंटन चैंपियनशिप की थीं, जिन्हें गलत तरीके से विदेशी आयोजन की तस्वीरों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।
बीएआई ने अदालत को बताया कि इन भ्रामक पोस्टों से न्यायपालिका, सार्वजनिक संस्थानों और खेल संगठन की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि झूठी जानकारी फैलाने और उसे बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों की पहचान करना आवश्यक हो सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सोशल मीडिया मंचों को ऐसी सामग्री प्रसारित करने वाले उपयोगकर्ताओं की मूलभूत जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जा सकते हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सामग्री हटाने या उसके स्रोतों के खिलाफ आगे की कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के वैधानिक ढांचे के तहत ही की जाएगी।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
