छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बलात्कार, आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (अबेटमेंट) और घर में घुसकर अपराध करने के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने कहा कि मामले में उपलब्ध मौखिक, परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आरोपी ने पीड़िता के साथ जबरन दुष्कर्म किया था, जिसके कारण मानसिक आघात और सामाजिक अपमान की भावना से पीड़िता ने उसी दिन आत्महत्या कर ली।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने विजय कुमार वर्मा द्वारा दायर आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते हुए 14 मार्च 2005 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बलौदाबाजार द्वारा सुनाए गए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को सही ठहराया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(1) (बलात्कार), धारा 306 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) और धारा 450 (गंभीर अपराध करने के उद्देश्य से घर में अनधिकृत प्रवेश) के तहत दोषी ठहराया था।

मामले के अनुसार, 22 अगस्त 2004 को रायपुर जिले के कसडोल थाना क्षेत्र के ग्राम कोलिहा में रहने वाली युवती घर पर अकेली थी, जबकि उसका भाई और भाभी खेत गए हुए थे। अभियोजन का आरोप था कि इसी दौरान आरोपी घर में घुसा, दरवाजा बंद कर पीड़िता के साथ जबरन दुष्कर्म किया। कुछ समय बाद जब पीड़िता का भाई घर पहुंचा और दरवाजा खुलवाया, तब आरोपी घर से निकलता हुआ दिखाई दिया। इसके बाद पीड़िता ने परिजनों को बताया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। घटना के तुरंत बाद उसने स्वयं को आग लगा ली। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई।
जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से जले हुए कपड़े, माचिस और अन्य वस्तुएं बरामद कीं। आरोपी के अंत:वस्त्र तथा पीड़िता के कपड़ों को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। एफएसएल रिपोर्ट में कई जब्त वस्तुओं पर शुक्राणु (स्पर्म) पाए जाने की पुष्टि हुई। अदालत ने माना कि यह वैज्ञानिक साक्ष्य अभियोजन की कहानी को मजबूत करता है और बलात्कार के आरोप को समर्थन देता है।
अपील में आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि उसे झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने दावा किया कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध थे तथा पीड़िता ने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उसका भाई उसे आरोपी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख बैठा था। इस दावे के समर्थन में कुछ कथित प्रेम पत्र भी पेश किए गए। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन के कई स्वतंत्र गवाह शत्रुतापूर्ण (होस्टाइल) हो गए थे और एक महत्वपूर्ण गवाह का परीक्षण नहीं किया गया, इसलिए दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि पीड़िता के भाई और भाभी की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत है तथा उसे वैज्ञानिक साक्ष्यों से भी समर्थन मिलता है। अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि पीड़िता के कपड़े फटे हुए मिले थे और कई वस्तुओं पर शुक्राणुओं के निशान पाए गए थे। न्यायालय के अनुसार यह परिस्थितियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि पीड़िता सहमति देने वाली पक्ष नहीं थी बल्कि प्रतिरोध कर रही थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता द्वारा घटना के तुरंत बाद अपनी भाभी को दी गई जानकारी भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत “रेस गेस्टे” (Res Gestae) सिद्धांत के तहत स्वीकार्य साक्ष्य है। अदालत ने माना कि यह बयान घटना के तुरंत बाद दिया गया था और उसमें किसी प्रकार की मनगढ़ंत कहानी गढ़ने की संभावना नहीं थी। न्यायालय ने कहा कि “पीड़िता द्वारा अपनी भाभी को तत्काल बताई गई घटना, घटना की निरंतरता का हिस्सा है और इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।”
रिश्तेदार गवाहों की विश्वसनीयता पर उठाए गए सवालों को भी अदालत ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल रिश्तेदार होना किसी गवाह को “इंटरेस्टेड विटनेस” नहीं बना देता। अदालत ने कहा, “किसी गवाह की गवाही को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित का करीबी रिश्तेदार है। न्यायालय को उसकी गवाही की विश्वसनीयता, सुसंगतता और अन्य साक्ष्यों से मेल का परीक्षण करना चाहिए।”
धारा 306 आईपीसी के संबंध में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी के कृत्य और पीड़िता की आत्महत्या के बीच सीधा संबंध स्थापित होता है। अदालत ने कहा, “भारतीय समाज में यदि किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो वह अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को खोने जैसा महसूस करती है तथा समाज का सामना करने में कठिनाई अनुभव करती है। ऐसे हालात उसे आत्महत्या जैसे कदम के लिए प्रेरित कर सकते हैं।” न्यायालय ने माना कि बलात्कार की घटना से उत्पन्न मानसिक आघात और अपमान की भावना ने पीड़िता को आत्महत्या के लिए विवश किया और यह धारा 107 तथा धारा 306 आईपीसी के तहत दुष्प्रेरण की श्रेणी में आता है।
धारा 450 आईपीसी के आरोप पर भी अदालत ने कहा कि आरोपी ने उस समय घर में प्रवेश किया जब पीड़िता अकेली थी और उसके अभिभावक घर पर मौजूद नहीं थे। आरोपी का उद्देश्य गंभीर अपराध करना था, इसलिए घर में प्रवेश से संबंधित अपराध के सभी आवश्यक तत्व सिद्ध होते हैं।
संपूर्ण साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं का पुनर्मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही आरोपी की जमानत निरस्त करते हुए उसे दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया।
यह फैसला बलात्कार और उसके परिणामस्वरूप आत्महत्या के मामलों में कारणात्मक संबंध (causal nexus) की न्यायिक व्याख्या के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी यौन अपराध के तुरंत बाद पीड़िता आत्महत्या कर लेती है और उपलब्ध साक्ष्य दोनों घटनाओं के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करते हैं, तो आरोपी को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का दोषी भी ठहराया जा सकता है।
