बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कृषि शिक्षक के पद पर भर्ती के लिए B.Ed. की अनिवार्य योग्यता से छूट देने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि भर्ती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करना नियम बनाने वाली संस्था या राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और न्यायालय अनिवार्य योग्यता में छूट देकर किसी विशेष वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अलग मानक तय नहीं कर सकता।
WPS No. 6260 of 2026 में 65 अभ्यर्थियों ने कृषि शिक्षक के पद पर चल रही भर्ती प्रक्रिया में B.Ed. की योग्यता तत्काल उपलब्ध न होने के बावजूद शामिल होने की अनुमति मांगी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वर्ष 2019 में लागू पात्रता व्यवस्था के तहत कृषि शिक्षक पद के लिए B.Ed. अनिवार्य नहीं था। बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने Ashokanand Patel & Others vs. State of Chhattisgarh & Others, WPS No. 3309/2024 में 5 फरवरी 2025 को फैसला देते हुए कृषि शिक्षकों के लिए B.Ed./D.Ed./TET संबंधी छूट को असंवैधानिक और अधिकार-विहीन घोषित किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 13 फरवरी 2026 को राजपत्र अधिसूचना जारी कर B.Ed. को अनिवार्य योग्यता के रूप में शामिल किया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नई योग्यता को मौजूदा भर्ती प्रक्रिया में लागू करने से पहले उम्मीदवारों को कोई उचित संक्रमणकालीन अवधि नहीं दी गई। उनका कहना था कि भर्ती का संक्षिप्त विज्ञापन 28 जुलाई 2026 को जारी हुआ और आवेदन की अंतिम तिथि 2 सितंबर 2026 निर्धारित है, जबकि B.Ed. पाठ्यक्रम पूरा करने में दो शैक्षणिक वर्ष लगते हैं। इसलिए उन्होंने एक बार के लिए संक्रमणकालीन छूट देने और B.Ed. बाद में निर्धारित अवधि में हासिल करने की अनुमति मांगी थी।
राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन बोर्ड की ओर से इस मांग का विरोध किया गया। उनका कहना था कि लागू नियमों और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी NCTE के विनियमों के तहत निर्धारित योग्यता से छूट का दावा नहीं किया जा सकता। राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि पूर्व में B.Ed. से दी गई छूट को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है और सरकार को NCTE Regulations, 2014 के अनुरूप B.Ed. योग्यता शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में अभ्यर्थी B.Ed. की अनिवार्यता की वैधता को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि केवल यह चाहते हैं कि उन्हें पुराने नियमों के तहत पात्र होने के आधार पर एक बार की छूट दी जाए। लेकिन अदालत ने माना कि जब पूर्व की छूट को असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है और डिवीजन बेंच के निर्देश के बाद B.Ed. को अनिवार्य योग्यता बनाया गया है, तब न्यायालय के आदेश से अलग छूट देना प्रभावी रूप से उसी अनिवार्य योग्यता में नया अपवाद बनाने के समान होगा।
अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराते हुए कहा, “Fixing eligibility criteria, minimum qualifications, and service rules belongs strictly to the rule-making authority”। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय अपनी राय को नियम बनाने वाली प्राधिकरण की राय के स्थान पर नहीं रख सकता और व्यक्तिगत उम्मीदवारों को राहत देने के लिए अनिवार्य भर्ती योग्यता को माफ नहीं कर सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की रिट अधिकारिता का इस्तेमाल भर्ती के निर्धारित मानकों को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य यह देखना है कि संबंधित निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक तो नहीं है। अदालत सामान्यतः निर्धारित न्यूनतम योग्यता में अपनी ओर से छूट नहीं दे सकती।
इस मामले में हाईकोर्ट ने Ashokanand Patel मामले में डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए पूर्व निर्णय को बाध्यकारी माना। उस निर्णय में वर्ष 2019 के नियमों के तहत कृषि शिक्षक पद के लिए B.Ed./D.Ed./TET की आवश्यक योग्यता से संबंधित छूट को असंवैधानिक और ultra vires घोषित करते हुए राज्य सरकार को NCTE Regulations, 2014 के अनुरूप B.Ed. योग्यता शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
इसी आधार पर जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने 20 अगस्त 2026 को याचिका को प्रथम दृष्टया ही निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। फैसले का सीधा प्रभाव वर्तमान कृषि शिक्षक भर्ती में शामिल होने की इच्छा रखने वाले उन उम्मीदवारों पर पड़ता है, जिनके पास निर्धारित समय पर B.Ed. की योग्यता नहीं है। आदेश यह भी स्पष्ट करता है कि भर्ती प्रक्रिया में लागू अनिवार्य योग्यता से व्यक्तिगत या एकमुश्त राहत मांगने का रास्ता न्यायिक आदेश के माध्यम से सामान्यतः उपलब्ध नहीं है।
