सुप्रीम कोर्ट ने कहा- लिंग चयन रोकने के लिए प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (PCPNDT) कानून का सख्ती से पालन जरूरी

Supreme Court of India

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में पुत्र प्राथमिकता और लिंग चयन जैसी कुप्रथाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (PCPNDT) अधिनियम का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि समाज में गहराई तक जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक सोच के कारण आज भी कन्या भ्रूण लिंग चयन और भेदभाव जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘जननी सुरक्षा योजना’ और ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’ जैसी योजनाओं के माध्यम से लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के प्रयास कर रही हैं। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से कम बना हुआ है।

पीठ ने जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश का बाल लिंगानुपात 1991 में 945 था, जो 2001 में घटकर 927 और 2011 में 919 रह गया। न्यायालय ने कहा कि यह गिरावट लैंगिक असंतुलन की गंभीरता को दर्शाती है और इसी कारण PCPNDT अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां एक डॉक्टर द्वारा दायर उस अपील को खारिज करते हुए कीं, जिसमें PCPNDT अधिनियम की धारा 23 के तहत कथित अपराधों का संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि लिंग चयन जैसी अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का कठोर अनुपालन अनिवार्य है।