छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवा कानून और अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके विरुद्ध लंबित विभागीय जांच को जारी रखते हुए बर्खास्तगी का आदेश पारित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि सामान्यतः कर्मचारी की मृत्यु के साथ ही विभागीय कार्यवाही समाप्त हो जाती है और उसके बाद पारित कोई भी दंडात्मक आदेश कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मृत कर्मचारी के विरुद्ध जारी बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए उसकी पत्नी के अनुकंपा नियुक्ति आवेदन पर 90 दिनों के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।
यह याचिका स्वर्गीय वेदांत श्रीवास्तव की पत्नी अर्चना श्रीवास्तव और उनके पिता ब्रजेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ने दायर की थी। वेदांत श्रीवास्तव की नियुक्ति वर्ष 2011 में इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी एंड एप्लाइड न्यूट्रिशन, नवा रायपुर में लैब अटेंडेंट के पद पर हुई थी तथा वर्ष 2013 में उनकी सेवाएं नियमित कर दी गई थीं।
वर्ष 2019 में संस्थान ने उनकी नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया। आरोप था कि नियुक्ति के दौरान आरक्षण रोस्टर का पालन नहीं किया गया और उनके द्वारा प्रस्तुत अनुभव प्रमाणपत्र विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप नहीं था। इसी चयन प्रक्रिया से नियुक्त अन्य कर्मचारियों को भी ऐसे ही नोटिस जारी किए गए थे।
वेदांत श्रीवास्तव ने इस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायालय से अंतरिम राहत मिलने के बाद अप्रैल 2024 में मामला इस निर्देश के साथ निस्तारित हुआ कि नियोक्ता उनके जवाब पर सुनवाई का अवसर देकर निर्णय ले। हालांकि विभागीय जांच पूरी होने से पहले ही 19 फरवरी 2025 को वेदांत श्रीवास्तव का निधन हो गया।
इसके बाद उनकी पत्नी अर्चना श्रीवास्तव ने 6 मार्च 2025 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। लेकिन कर्मचारी की मृत्यु के बावजूद संस्थान ने 15 मई 2025 को उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया। इसी बर्खास्तगी का आधार बनाते हुए 5 अगस्त 2025 को विधवा का अनुकंपा नियुक्ति आवेदन भी अस्वीकार कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि कर्मचारी की मृत्यु के साथ ही विभागीय कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाती है। इसलिए मृत्यु के बाद जारी बर्खास्तगी आदेश पूरी तरह अवैध है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के ए.के.एस. राठौर बनाम भारत संघ मामले के निर्णय तथा राज्य शासन के 3 मार्च 2012 और 13 जुलाई 2026 के परिपत्रों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच मृत व्यक्ति के विरुद्ध जारी नहीं रह सकती। ऐसे में बर्खास्तगी आदेश पर आधारित अनुकंपा नियुक्ति अस्वीकृति भी स्वतः अवैध हो जाती है।
दूसरी ओर संस्थान ने तर्क दिया कि विभागीय जांच कर्मचारी की मृत्यु के बाद भी जारी रखी जा सकती है। इसके समर्थन में झारखंड हाईकोर्ट के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि बर्खास्तगी के बाद नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध समाप्त हो चुका था, इसलिए विधवा अनुकंपा नियुक्ति की पात्र नहीं है।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राकेश मोहन पाण्डेय ने पाया कि कर्मचारी के विरुद्ध आरोप केवल नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता और अनुभव प्रमाणपत्र के प्रारूप से संबंधित थे। उनके खिलाफ सरकारी धन के गबन, वित्तीय अनियमितता या सार्वजनिक धन की हानि जैसे गंभीर आरोप नहीं थे।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ए.के.एस. राठौर फैसले का उल्लेख करते हुए दोहराया कि “मृत व्यक्ति के विरुद्ध न तो विभागीय कार्यवाही शुरू की जा सकती है और न ही उसे आगे बढ़ाया जा सकता है। कर्मचारी की मृत्यु के साथ ऐसी कार्यवाही समाप्त हो जाती है।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में, जहां सरकारी धन की वसूली या वित्तीय गड़बड़ी का प्रश्न हो, वहां सीमित उद्देश्य से कानूनी उत्तराधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई संभव हो सकती है। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई आरोप नहीं था, इसलिए उस अपवाद का लाभ संस्थान को नहीं मिल सकता।
न्यायालय ने माना कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद विभागीय जांच जारी रखना और उसके आधार पर 15 मई 2025 को बर्खास्तगी आदेश जारी करना अवैध और मनमाना था। चूंकि विधवा का अनुकंपा नियुक्ति आवेदन केवल इसी अवैध बर्खास्तगी आदेश के आधार पर अस्वीकार किया गया था, इसलिए 5 अगस्त 2025 का अस्वीकृति आदेश भी निरस्त कर दिया गया।
याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट को निर्देश दिया कि अर्चना श्रीवास्तव के अनुकंपा नियुक्ति आवेदन पर प्रचलित नीति के अनुसार नए सिरे से विचार किया जाए और सक्षम प्राधिकारी न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने से 90 दिनों के भीतर निर्णय लेकर पूरी प्रक्रिया पूर्ण करे।
यह फैसला सेवा कानून के उस स्थापित सिद्धांत को और मजबूत करता है कि सामान्य परिस्थितियों में कर्मचारी की मृत्यु के साथ विभागीय कार्यवाही समाप्त हो जाती है। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत कर्मचारी के आश्रितों को केवल मृत्यु के बाद पारित अवैध विभागीय आदेशों के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति या अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है कि मृत कर्मचारियों के परिवारों के अधिकारों से जुड़े मामलों में कानून और न्यायिक मिसालों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।
