बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल पति से अलग घर में रहने की इच्छा व्यक्त करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है, लेकिन परिस्थितियों के आधार पर यदि कोई पक्ष लगातार और अनुचित तरीके से दूसरे जीवनसाथी पर अपने माता-पिता से अलग होने का दबाव बनाता है और इससे वैवाहिक जीवन जारी रखना कठिन हो जाता है, तो ऐसा आचरण मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने गुरप्रीत कौर बनाम दतिंदर सिंह भाटिया मामले में पत्नी की अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय द्वारा दी गई तलाक की डिक्री को बरकरार रखा।
यह मामला FA(MAT) No. 411 of 2024, Gurpreet Kaur v. Datinder Singh Bhatia से संबंधित है। हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को अपना फैसला सुनाया। इससे पहले डोंगरगढ़ के जिला न्यायाधीश ने 11 नवंबर 2024 को HMA Case No. 6A/2020 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के तहत पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी। पत्नी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पति और पत्नी का विवाह 8 मार्च 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पति का कहना था कि विवाह के शुरुआती करीब डेढ़ वर्ष तक दोनों के संबंध सामान्य रहे, लेकिन इसके बाद विवाद शुरू हो गए। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी लगातार उस पर अपने माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती थी। पति के अनुसार उसके पिता गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थे और उनकी तीन बार हार्ट सर्जरी हो चुकी थी, इसलिए वह अपने पिता को छोड़कर अलग रहने के लिए तैयार नहीं था।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसके माता-पिता के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं करती थी और कई बार बिना सूचना दिए अपने छोटे बेटे को लेकर मायके चली जाती थी। उसने बच्चे का दाखिला भी मायके के क्षेत्र में करा दिया था। मामले को सुलझाने के लिए 6 सितंबर 2018 को परिवार और समुदाय के स्तर पर बैठक हुई, जिसमें पत्नी द्वारा एक माफी पत्र दिए जाने की बात सामने आई। पति का कहना था कि इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हुए।
मामला आगे बढ़ने पर पत्नी अक्टूबर 2019 में अपने मायके चली गई और फिर वापस नहीं लौटी। इसके बाद 22 जनवरी 2020 को राजनांदगांव में एक वैवाहिक समारोह के दौरान दोनों पक्षों के परिवारों के बीच विवाद हुआ। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी के परिवार के सदस्यों ने उसके परिवार के साथ दुर्व्यवहार किया और धमकी दी। इस घटना की पुलिस में शिकायत भी की गई थी।
पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पति अपनी मां के प्रभाव में उसके साथ क्रूर व्यवहार करता था। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके माता-पिता से पेट्रोल पंप स्थापित करने के लिए 50 लाख रुपये की मांग की गई थी और मांग पूरी नहीं होने पर उसके साथ मारपीट की गई। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे रात में उसके भाई के घर छोड़ दिया गया और उसके बेटे को पति अपने साथ ले गया। पत्नी के अनुसार बड़े बेटे आर्यांश की बीमारी से मृत्यु के बाद भी उसे पति और ससुराल पक्ष से आवश्यक भावनात्मक सहयोग नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि पत्नी के भाई और उसके मामा, जो दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने के प्रयासों में शामिल थे, उन्होंने माफी पत्र के निष्पादन और उस पर अपने हस्ताक्षरों की पुष्टि की थी। पत्नी का यह कहना था कि उसने खाली कागज पर हस्ताक्षर किए थे और बाद में उसका इस्तेमाल माफी पत्र तैयार करने में किया गया। हालांकि, उसके मामा ने बयान दिया कि उन्होंने पत्र को पढ़ने के बाद उस पर हस्ताक्षर किए थे और पत्र तैयार किए जाने के समय पति या उसके परिवार का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था। हाईकोर्ट ने इस आधार पर पत्नी की आपत्ति को विश्वसनीय नहीं माना।
अदालत ने पति के पिता की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति माना। कोर्ट ने कहा कि पिता की तीन बार हार्ट सर्जरी होने का तथ्य विवादित नहीं था। ऐसी स्थिति में पति का अपने बीमार पिता से अलग नहीं होना अनुचित नहीं कहा जा सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद भी किसी व्यक्ति की अपने वृद्ध या बीमार माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियां पूरी तरह समाप्त नहीं हो जातीं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण स्पष्टता दी कि “अलग वैवाहिक घर की मांग मात्र से हर स्थिति में इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता।” अदालत के अनुसार किसी पत्नी या पति द्वारा अलग रहने की इच्छा व्यक्त करने के पीछे उचित और न्यायसंगत कारण हो सकता है। इसलिए हर मामले में परिस्थितियों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण आवश्यक है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Narendra v. K. Meena, (2016) 9 SCC 455 के फैसले का भी उल्लेख किया। इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि परिस्थितियों के आधार पर पति को उसके परिवार से अलग करने का लगातार और अनुचित प्रयास मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अलग घर की इच्छा या मांग को स्वतः क्रूरता नहीं माना जा सकता। यह देखा जाना आवश्यक है कि मांग किन परिस्थितियों में की गई और उसका वैवाहिक संबंध पर क्या प्रभाव पड़ा।
हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता के संबंध में कहा कि किसी एक घटना को अलग करके फैसला नहीं किया जा सकता। वैवाहिक संबंधों का मूल्यांकन पूरे घटनाक्रम को देखते हुए किया जाना चाहिए। पति-पत्नी के बीच सामान्य मतभेद, छोटी-मोटी कहासुनी या वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य उतार-चढ़ाव को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि किसी पक्ष का व्यवहार लगातार बना रहे और उससे वैवाहिक जीवन जारी रखना कठिन हो जाए, तो परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर वह मानसिक क्रूरता बन सकता है।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने कहा, “वैवाहिक संबंध किसी भी पक्ष को यह असीमित अधिकार नहीं देता कि वह दूसरे पक्ष को अपनी पूर्व से चली आ रही पारिवारिक जिम्मेदारियों को छोड़ने या त्यागने के लिए मजबूर करे।” कोर्ट ने माना कि विवाह एक नया पारिवारिक संबंध जरूर बनाता है, लेकिन इससे वृद्ध या बीमार माता-पिता के प्रति व्यक्ति की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियां स्वतः समाप्त नहीं होतीं।
मामले में हाईकोर्ट ने पति द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों, माफी पत्र और दोनों पक्षों के लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सामूहिक रूप से देखते हुए निष्कर्ष निकाला कि पत्नी का आचरण पति के लिए मानसिक क्रूरता का कारण बना और वैवाहिक संबंध को जारी रखना कठिन हो गया था। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के निष्कर्षों में ऐसी कोई कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं पाई, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जा सके।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज कर दी और 11 नवंबर 2024 को डोंगरगढ़ जिला न्यायालय द्वारा पारित तलाक की डिक्री को बरकरार रखा। इस मामले में मुख्य कानूनी प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) है, जिसके तहत क्रूरता तलाक का आधार है। हाईकोर्ट में अपील धारा 28 के तहत दायर की गई थी।
इस फैसले का महत्व इस बात में है कि हाईकोर्ट ने अलग रहने के अधिकार और मानसिक क्रूरता के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। फैसला यह नहीं कहता कि पत्नी द्वारा ससुराल से अलग रहने की मांग करना अपने आप में क्रूरता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले में मांग के पीछे के कारण, पति-पत्नी के व्यवहार, पारिवारिक परिस्थितियों, विवाद की निरंतरता और उसके वैवाहिक जीवन पर प्रभाव को समग्र रूप से देखना होगा।
