छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरपंच के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया।

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की ग्राम पंचायत अहिल्दा की निर्वाचित सरपंच फुलिया देवी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव की बैठक पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में न्यायालय को तभी दखल देना चाहिए जब किसी अनिवार्य वैधानिक प्रावधान का स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन हुआ हो। केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा शुरू की गई लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।

मामला ग्राम पंचायत अहिल्दा की सरपंच फुलिया देवी के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ा था। उपखंड अधिकारी (राजस्व) एवं प्राधिकृत अधिकारी ने छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 तथा छत्तीसगढ़ पंचायत (अविश्वास प्रस्ताव) नियम, 1994 के तहत 23 अप्रैल 2026 को बैठक बुलाने की सूचना जारी की थी। सरपंच ने इस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दावा किया कि उन्हें सात स्पष्ट दिनों का नोटिस नहीं दिया गया और अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए।

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि नोटिस 16 अप्रैल 2026 को प्राप्त हुआ, जबकि बैठक 23 अप्रैल को निर्धारित थी। इसलिए नियम 3(3) में निर्धारित “स्पष्ट सात दिन” की अनिवार्य अवधि पूरी नहीं हुई। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रस्ताव की प्रति और अन्य दस्तावेज न दिए जाने से उन्हें अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का अवसर नहीं मिला।

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH
JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

राज्य सरकार तथा अन्य प्रतिवादियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि नोटिस 13 अप्रैल 2026 को जारी किया गया था और नियमों के अनुसार सात दिन की अवधि की गणना नोटिस जारी या प्रेषित किए जाने की तारीख से की जाती है, न कि उसकी प्राप्ति की तारीख से। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम पंचायत के 20 पंचों में से 15 पंचों ने अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया है, जो अधिनियम में निर्धारित आवश्यक संख्या से अधिक है।

न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने मामले की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 21 तथा अविश्वास प्रस्ताव नियम, 1994 के प्रावधानों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने पूर्व के न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि सात दिन की अवधि की गणना नोटिस के प्रेषण या जारी होने की तारीख से की जाती है। चूंकि इस मामले में नोटिस 13 अप्रैल को जारी हुआ और बैठक 23 अप्रैल को निर्धारित थी, इसलिए नियम 3(3) का पर्याप्त अनुपालन माना जाएगा।

अदालत ने यह भी पाया कि ग्राम पंचायत की कुल संरचना में 15 पंचों का समर्थन अविश्वास प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। न्यायालय के अनुसार वास्तविक मतदान और प्रस्ताव पारित होने का प्रश्न बैठक के दौरान तय होगा। इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रस्ताव आवश्यक वैधानिक समर्थन से वंचित है।

दस्तावेज उपलब्ध न कराए जाने और अन्य प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जो प्रारंभिक चरण में पूरी प्रक्रिया को अवैध ठहरा दें। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरपंच को अधिनियम की धारा 21(2) के तहत बैठक में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने और बहस में भाग लेने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

निर्णय में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा शुरू की गई लोकतांत्रिक प्रक्रिया में न्यायालय को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, जब तक कि किसी अनिवार्य कानूनी प्रावधान का स्पष्ट उल्लंघन और उससे उत्पन्न प्रत्यक्ष अन्याय सिद्ध न हो।” अदालत ने यह भी माना कि केवल संभावित प्रक्रियात्मक आपत्तियों के आधार पर अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया को रोकना लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत होगा।

इस फैसले का प्रभाव यह होगा कि पंचायतों में अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर न्यायालय की सीमित हस्तक्षेप नीति और अधिक स्पष्ट हुई है। साथ ही यह निर्णय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की सामूहिक इच्छा और लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया को महत्व देने वाला माना जा रहा है।