छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2005 के एक बिजली चोरी मामले में आरोपी को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि रद्द कर दी। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने अवैध रूप से बिजली का उपयोग किया था। अदालत ने पाया कि कथित 25 फीट बिजली तार की बरामदगी नहीं हुई और बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 126 के तहत अनधिकृत बिजली खपत का आवश्यक आकलन भी नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जब्ती के पंच गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और कहा कि उनसे खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे। इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि आरोपी के विरुद्ध अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं होता। इसके आधार पर विशेष न्यायालय द्वारा धारा 135 के तहत सुनाई गई दो वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा को निरस्त कर आरोपी को बरी कर दिया गया।
