नई दिल्ली – भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मंगलवार को कहा कि न्यायपालिका की आवाज तर्कपूर्ण होनी चाहिए, लेकिन उसमें संवेदनशीलता भी बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय दृढ़ हो, पर अहंकारी नहीं और पूरी तरह संवैधानिक होते हुए भी मानवीय बना रहे। वे उपराष्ट्रपति आवास परिसर में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) भूषण आर. गवई के भाषणों के संकलन ‘द वॉइस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स’ के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह पुस्तक केवल स्मरण ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक दृष्टिकोण को सामने लाती है जो न्यायिक निर्णयों के पीछे कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालय के निर्णय कानून की व्याख्या करते हैं, अधिकारों का निर्धारण करते हैं और अपने कारण दर्ज करते हैं, लेकिन वे किसी विशेष मामले की सीमाओं में बंधे होते हैं। इसके विपरीत, न्यायाधीशों के सार्वजनिक व्याख्यान उनके व्यापक संवैधानिक चिंतन और समाज के प्रति दृष्टिकोण को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायमूर्ति भूषण आर. गवई के भाषणों में तीन प्रमुख विषय स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं। पहला, न्याय तक समान पहुंच। उन्होंने कहा कि संविधान अपने आप लागू नहीं हो जाता, बल्कि उसके वादे तभी साकार होते हैं जब संस्थाएं प्रत्येक विवाद के पीछे मौजूद व्यक्ति की परिस्थितियों को समझें। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति गवई ने अपने अनेक संबोधनों में निःशुल्क विधिक सहायता, विचाराधीन कैदियों के अधिकारों और संविधान के अनुच्छेद 39(क) के महत्व पर विशेष बल दिया है। यह इस बात का संदेश है कि न्याय किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि दूसरा महत्वपूर्ण विषय मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन है, जबकि तीसरा विषय तेजी से बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश में न्यायिक संस्थाओं के संतुलित और उत्तरदायी दृष्टिकोण से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि आज प्रौद्योगिकी का विकास कानून से अधिक तेज गति से हो रहा है, सामाजिक असमानताएं अब भी बनी हुई हैं और न्यायिक संस्थाओं के सामने जनता का विश्वास बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में न्यायमूर्ति गवई के विचार यह बताते हैं कि कानून आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हो, लेकिन उसका मानवीय स्वरूप कभी समाप्त न हो। साथ ही न्यायालय जटिलताओं के बीच भी आम नागरिक के लिए सुलभ बने रहें और संवैधानिक नैतिकता केवल न्यायिक निर्णयों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी दिखाई दे।
कार्यक्रम के अंत में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह पुस्तक केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि न्यायपालिका और विधि समुदाय के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक भी है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक देशभर के न्यायालयों के पुस्तकालयों, विधि महाविद्यालयों, न्यायाधीशों के कक्षों और विशेष रूप से युवा अधिवक्ताओं तक पहुंचेगी तथा उन्हें संविधान की मूल भावना को समझने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगी।
