निष्पादन न्यायालय डिक्री से आगे नहीं जा सकता, उसे लागू करना ही उसका दायित्व: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निष्पादन (Execution) न्यायालय का अधिकार केवल डिक्री को लागू करने तक सीमित है। वह न तो डिक्री से आगे जाकर कोई नया निर्णय दे सकता है और न ही उसके प्रावधानों में परिवर्तन कर सकता है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति प्रसाद की एकलपीठ ने बलौदाबाजार निवासी पारस वर्मा द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए की।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता ने राजस्व विभाग द्वारा तैयार किए गए बंटवारा दस्तावेज (फर्द बंटवारा) को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि दस्तावेज में डिक्री के अनुरूप हिस्सा नहीं दर्शाया गया है और उन्हें निर्धारित 1/4 हिस्सा नहीं मिल रहा है।

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH
JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2011 में पारित सिविल डिक्री अंतिम रूप से प्रभावी हो चुकी है। न्यायालय ने कहा कि निष्पादन अदालत का कार्य केवल डिक्री का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है। वह डिक्री की व्याख्या केवल उसे लागू करने की सीमा तक कर सकती है, लेकिन उसमें संशोधन, परिवर्तन या पुनर्विचार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता को राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों से कोई शिकायत है, तो उसके लिए सक्षम वैधानिक मंच उपलब्ध है। ऐसे मामलों में संबंधित राजस्व अपीलीय प्राधिकारी अथवा अन्य सक्षम मंच के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया, हालांकि याचिकाकर्ता को वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।