बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारी के स्थानांतरण और पदस्थापना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कोई कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर स्थानांतरण या पदस्थापना की मांग को कानूनी अधिकार के रूप में पेश नहीं कर सकता। प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर कर्मचारी की पदस्थापना कहां की जाए, यह मुख्य रूप से सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत केवल इस आधार पर प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती कि कर्मचारी के अनुसार कोई दूसरी व्यवस्था अधिक उपयुक्त होती।
यह फैसला अनिकेत यादव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, रिट याचिका (सेवा) क्रमांक 6125/2026, दिनांक 18 अगस्त 2026 में आया। मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने की। इस मामले का न्यायालयीन संदर्भ 2026:CGHC:36789 है।
याचिकाकर्ता अनिकेत यादव नगर पालिक निगम भिलाई-चरौदा में सहायक ग्रेड-2 के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने 31 जुलाई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें नगर पालिक निगम भिलाई-चरौदा से नगर पालिक निगम राजनांदगांव स्थानांतरित किया गया था। उनकी मांग थी कि उन्हें उनके मूल संस्थान यानी नगर पालिक निगम रायपुर में वापस पदस्थ किया जाए।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता की प्रारंभिक नियुक्ति नगर पालिक निगम रायपुर में सहायक ग्रेड-3 के पद पर हुई थी। इसके बाद 30 सितंबर 2021 को उनका स्थानांतरण नगर पालिक निगम रायपुर से नगर पालिक निगम रिसाली किया गया। वहां उन्हें स्वीकृत पदों की संख्या की तुलना में अधिक कर्मचारी यानी सरप्लस पाया गया। इसके बाद 18 सितंबर 2025 को उन्हें नगर पालिक निगम रिसाली से नगर पालिक निगम भिलाई-चरौदा स्थानांतरित किया गया, लेकिन वहां भी उन्हें सरप्लस बताया गया।
याचिकाकर्ता ने इसके बाद अपनी मूल पदस्थापना नगर पालिक निगम रायपुर में वापस किए जाने के लिए विभाग के समक्ष अभ्यावेदन दिया। जब अभ्यावेदन पर कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने हाईकोर्ट में WPS No. 349/2026 दायर की। हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को याचिका का निराकरण करते हुए उन्हें नया और विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी तथा सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार उस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
निर्धारित अवधि में अभ्यावेदन पर निर्णय नहीं होने पर याचिकाकर्ता ने Contempt Petition No. 841/2026 भी दायर की। इसी दौरान 28 जुलाई 2026 को उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया। उन्होंने रायपुर नगर निगम में वापस पदस्थ करने की मांग की और यह भी कहा कि यदि विभिन्न नगर निगमों में उन्हें बार-बार सरप्लस पाया जा रहा है तो उनकी सहमति लेकर प्रतिनियुक्ति के माध्यम से समायोजन पर विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, इसके बाद विभाग ने 31 जुलाई 2026 को उन्हें नगर पालिक निगम भिलाई-चरौदा से नगर पालिक निगम राजनांदगांव स्थानांतरित कर दिया। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि रायपुर से रिसाली, रिसाली से चरौदा और फिर राजनांदगांव किए गए लगातार स्थानांतरण से पता चलता है कि उनकी समस्या और रायपुर वापसी के अनुरोध पर उचित विचार नहीं किया गया।
राज्य की ओर से इस दलील का विरोध किया गया। सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता चरौदा में सरप्लस पाए गए थे और उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें दूसरे नगर निगम में स्थानांतरित किया गया। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने कहा कि याचिकाकर्ता को चरौदा में सरप्लस पाया गया था और उन्होंने स्वयं दूसरे नगर निगम में स्थानांतरण की मांग की थी। ऐसी स्थिति में केवल इसलिए रायपुर में पदस्थापना का अधिकार नहीं बन जाता कि वह उनका मूल संस्थान था या वहां उन्होंने पहले काम किया था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को एक नगर निगम से दूसरे नगर निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजने की संभावना को मौजूदा स्थानांतरण आदेश को चुनौती देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने कहा, “सरप्लस कर्मचारी को कहां समायोजित किया जाना है, यह मूल रूप से प्रशासनिक विषय है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी कर्मचारी का एक से अधिक बार स्थानांतरण होना अपने आप में बाद के स्थानांतरण आदेश को अवैध नहीं बना देता। इसी तरह, कर्मचारी की किसी विशेष स्थान पर पदस्थापना की इच्छा मात्र से प्रशासन उस मांग को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होता।
अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के Namrata Verma v. State of Uttar Pradesh & Others, 2021 SCC OnLine SC 3337 के फैसले का भी उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने स्थापित न्यायिक सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि कर्मचारी यह तय करने की जिद नहीं कर सकता कि उसे किस स्थान पर स्थानांतरित किया जाए या किस स्थान पर नहीं किया जाए। स्थानांतरण का निर्णय प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नियोक्ता द्वारा लिया जाना है।
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या है। यदि स्थानांतरण आदेश कानून के विपरीत, दुर्भावनापूर्ण या किसी अन्य स्पष्ट कानूनी दोष से प्रभावित हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन केवल इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी या अदालत की नजर में कोई दूसरी पदस्थापना अधिक सुविधाजनक हो सकती थी।
इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला जिससे 31 जुलाई 2026 के स्थानांतरण आदेश को कानूनी रूप से अस्थिर माना जा सके। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के लगातार स्थानांतरण और रायपुर में पदस्थापना की मांग अपने आप में हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने WPS No. 6125/2026 को खारिज कर दिया। इस फैसले का व्यापक महत्व सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय निकायों के कर्मचारियों के लिए है। निर्णय यह स्पष्ट करता है कि किसी कर्मचारी की पसंदीदा जगह पर पदस्थापना सामान्यतः उसका कानूनी अधिकार नहीं है। प्रशासनिक जरूरत, स्वीकृत पदों की स्थिति और कर्मचारी के समायोजन जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सक्षम प्राधिकारी स्थानांतरण का निर्णय ले सकता है।
