सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा जारी जुलाई 2026 के प्रस्ताव और परिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया और केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दोनों पक्षों से इस मामले में जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मंगलवार को उत्तराखंड बार काउंसिल के दस निर्वाचित सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने वैधानिक अधिकारों से आगे बढ़कर राज्य बार काउंसिलों की निर्वाचित सदस्य संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है, जबकि ऐसा करने का अधिकार केवल संसद को है। उनका तर्क है कि BCI बिना किसी विधायी संशोधन के बार काउंसिलों की संरचना में बदलाव नहीं कर सकती।
यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में दिए गए उस निर्णय के बाद उत्पन्न हुआ, जिसमें अदालत ने राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं की 30 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के अनुपालन में BCI ने 19 जुलाई 2026 को एक प्रस्ताव पारित किया और बाद में एक परिपत्र जारी कर आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया तय की।
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अनुसार राज्य बार काउंसिलों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या 15, 20 या 25 निर्धारित है। BCI ने अपने प्रस्ताव में कहा कि 25 सदस्यीय बार काउंसिल में कम से कम 7, 20 सदस्यीय परिषद में 6 और 15 सदस्यीय परिषद में 4 महिला सदस्य होना आवश्यक होगा।
सबसे बड़ा विवाद BCI की उस व्यवस्था को लेकर है, जिसमें कहा गया है कि यदि निर्धारित संख्या में महिलाएं चुनाव जीतकर नहीं आती हैं, तो उनकी कमी पूरी करने के लिए अतिरिक्त निर्वाचित सीटें बनाई जाएंगी। उदाहरण के लिए, यदि 25 सदस्यीय बार काउंसिल में एक भी महिला निर्वाचित नहीं होती है, तो सात अतिरिक्त सीटों पर चुनाव कराया जाएगा और परिषद की कुल सदस्य संख्या 32 हो जाएगी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था सीधे तौर पर राज्य बार काउंसिलों की वैधानिक संरचना में बदलाव करती है, जबकि ऐसा केवल संसद द्वारा अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन करके ही किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहीं भी निर्वाचित सीटों की संख्या बढ़ाने की अनुमति नहीं दी थी।
याचिका में दावा किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए 20 प्रतिशत निर्वाचित महिला सदस्यों और 10 प्रतिशत सह-नामित (Co-opted) महिला सदस्यों की व्यवस्था का संकेत दिया था, न कि परिषदों की कुल सदस्य संख्या बढ़ाने का।
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि BCI ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई सीमित स्वतंत्रता की गलत व्याख्या करते हुए एकतरफा तरीके से अतिरिक्त सीटों का प्रावधान कर दिया, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उनके अनुसार, यह कदम विधायी शक्ति का अनुचित प्रयोग है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से जुलाई 2026 के BCI प्रस्ताव और परिपत्र को रद्द करने की मांग की गई है। साथ ही, उत्तराखंड बार काउंसिल के फरवरी 2026 में हुए चुनाव के परिणामों को प्रभावित करने वाली किसी भी कार्रवाई पर रोक लगाने तथा यह घोषित करने का भी अनुरोध किया गया है कि उत्तराखंड बार काउंसिल की निर्वाचित सदस्य संख्या 25 से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती, जब तक कि संसद कानून में संशोधन न करे या सुप्रीम कोर्ट स्वयं ऐसा निर्देश न दे।
यह मामला महिलाओं के प्रतिनिधित्व और बार काउंसिलों की वैधानिक संरचना के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक और विधिक प्रश्न उठाता है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय भविष्य में देशभर की राज्य बार काउंसिलों में महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करेगा।
