प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के कथित पदाधिकारी शाहिद खान की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लंबित आपराधिक मुकदमों और अंडरट्रायल कैदियों की लंबी हिरासत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, विशेषकर तब जब मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक आगे नहीं बढ़ रही हो।
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि जब अभियोजन पक्ष 707 गवाहों, जिनमें 67 संरक्षित गवाह भी शामिल हैं, को पेश करने की बात कर रहा है, तब लगभग चार वर्षों से न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी के मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की कोई वास्तविक संभावना दिखाई नहीं देती। अदालत ने इस पर सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में गवाहों के साथ मुकदमे को व्यावहारिक रूप से कैसे पूरा किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कर्नाटक सरकार को विस्तृत अभियोजन योजना (प्रोसिक्यूशन प्लान) दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह बताए कि वह किन गवाहों की गवाही वास्तव में आवश्यक मानती है, कितने संरक्षित गवाहों की जरूरत है और मुकदमे को पूरा करने की यथार्थवादी समय-सीमा क्या होगी।
अभियोजन के अनुसार शाहिद खान इस मामले में आरोपी संख्या 14 हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने पीएफआई के अन्य पदाधिकारियों और सदस्यों के साथ मिलकर मुस्लिम युवाओं के कट्टरपंथीकरण, गैरकानूनी गतिविधियों के लिए धन जुटाने तथा भारत सरकार के खिलाफ साजिश रचने में भूमिका निभाई। अभियोजन का यह भी आरोप है कि यह साजिश एक बड़े आतंकी नेटवर्क का हिस्सा थी और भाजपा युवा मोर्चा के नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्या से भी जुड़ी हुई थी। शाहिद खान पर वर्ष 2019 से 2022 के बीच पीएफआई के दावणगेरे जोन के जिला अध्यक्ष के रूप में संगठनात्मक बैठकों और भर्ती गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि शाहिद खान पिछले तीन वर्ष दस महीने से जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए शीघ्र सुनवाई के निर्देश के बावजूद मुकदमे में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। फरवरी 2026 में आरोप तय होने के बाद भी अगस्त 2026 तक केवल पहले अभियोजन गवाह का ही बयान दर्ज किया जा सका है। यह भी दलील दी गई कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने लंबी हिरासत और मुकदमे में देरी के पहलू पर पर्याप्त विचार किए बिना जमानत याचिका खारिज कर दी।
राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े गंभीर आरोपों का है। साथ ही अभियोजन ने अदालत से मुकदमे की आगे की रणनीति और साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पर निर्देश प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को त्वरित सुनवाई का मौलिक अधिकार प्राप्त है और केवल गंभीर आरोप होने से इस अधिकार को अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि अभियोजन को केवल उन्हीं गवाहों को पेश करना चाहिए जिनकी गवाही आरोप सिद्ध करने के लिए वास्तव में आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने के बजाय एक व्यवस्थित अभियोजन रणनीति अपनाई जानी चाहिए ताकि सुनवाई समयबद्ध ढंग से पूरी हो सके।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि इसी मामले के नौ सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इन परिस्थितियों और मुकदमे में हो रही देरी को देखते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः कर्नाटक सरकार को विस्तृत अभियोजन योजना दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की। अब अदालत राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत योजना के आधार पर मुकदमे की प्रगति और जमानत याचिका पर आगे विचार करेगी।
