नई दिल्ली: बिहार सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य (MLC) नामित कर दिया गया है। सरकार के अनुसार, विधान परिषद की सदस्यता मिलने के बाद अब उनके मंत्री पद पर बने रहने को लेकर संवैधानिक बाधा नहीं है। यह जानकारी उस याचिका की सुनवाई के दौरान दी गई जिसमें दीपक प्रकाश को बिहार मंत्रिपरिषद से हटाने की मांग की गई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने राज्य सरकार को दीपक प्रकाश के विधान परिषद में नामांकन से संबंधित अधिसूचना रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया। इसके साथ ही मामले की सुनवाई आगे के लिए स्थगित कर दी गई।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि दीपक प्रकाश अपनी पहली नियुक्ति के समय बिहार विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे और संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत उन्हें छह महीने की निर्धारित अवधि के भीतर राज्य विधानमंडल का सदस्य बनना आवश्यक था।
दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में पंचायती राज मंत्री बनाया गया था। उस समय वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में सरकार में बदलाव के दौरान उन्होंने मंत्री पद खो दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें 7 मई 2026 को दोबारा पंचायती राज मंत्री बनाया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि मंत्री पद से थोड़े समय के लिए हटना और फिर दोबारा मंत्री बनाए जाना संविधान के अनुच्छेद 164(4) में निर्धारित छह महीने की सीमा को नए सिरे से शुरू नहीं कर सकता। याचिका के अनुसार, दीपक प्रकाश पहले ही लगभग चार महीने और 26 दिन की अवधि का उपयोग कर चुके थे और छह महीने की संवैधानिक अवधि 19 मई को समाप्त हो गई थी।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को क्या बताया?
बिहार सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि दीपक प्रकाश को अब विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित किया जा चुका है। सरकार ने यह भी बताया कि उनका मूल मंत्री पद समाप्त हो चुका था और बाद में उन्हें नए सिरे से मंत्री नियुक्त किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नामांकन से संबंधित अधिसूचना को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है। अब यह महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इस बाद में हुई विधान परिषद सदस्यता को दीपक प्रकाश की पूर्व और वर्तमान मंत्री नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका के संदर्भ में किस प्रकार देखती है।
याचिकाकर्ता ने दी SR Chaudhuri फैसले की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से दीपक प्रकाश को हटाने की मांग जारी रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2001 के फैसले S.R. Chaudhuri v. State of Punjab पर भरोसा किया गया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी ऐसे व्यक्ति को, जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं है, लगातार छह-छह महीने की अवधि के लिए बार-बार मंत्री नियुक्त करके संविधान के अनुच्छेद 164(4) की अनिवार्यता को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
अदालत ने उस मामले में माना था कि मंत्री के पद से थोड़े समय के लिए इस्तीफा देकर और फिर बिना चुनाव जीते दोबारा मंत्री नियुक्त करके संवैधानिक सीमा को दरकिनार नहीं किया जा सकता। संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंत्री अंततः जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में राज्य विधानमंडल में स्थान प्राप्त करे।
अनुच्छेद 164(4) का महत्व
संविधान का अनुच्छेद 164(4) ऐसी स्थिति में व्यक्ति को मंत्री बनाए जाने की अनुमति देता है जब वह नियुक्ति के समय राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य न हो। हालांकि, ऐसी नियुक्ति छह महीने से अधिक अवधि तक जारी नहीं रह सकती, जब तक कि संबंधित व्यक्ति इस अवधि के भीतर विधानमंडल का सदस्य नहीं बन जाता।
यही प्रावधान दीपक प्रकाश के मामले में मुख्य संवैधानिक विवाद का केंद्र है। सवाल यह है कि क्या किसी गैर-विधायक मंत्री के इस्तीफे और उसके बाद दोबारा नियुक्त किए जाने से छह महीने की संवैधानिक अवधि फिर से शुरू हो सकती है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि ऐसा करना संविधान में निर्धारित सीमा को अप्रत्यक्ष रूप से दरकिनार करने का प्रयास होगा। इसे याचिका में “colourable exercise of constitutional power” बताया गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल?
दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नामित किए जाने के बाद मामले में एक नया संवैधानिक पहलू जुड़ गया है। अब अदालत को यह देखना होगा कि बाद में मिली विधान परिषद सदस्यता का प्रभाव उनकी पहले की मंत्री नियुक्ति और 7 मई 2026 की पुनर्नियुक्ति पर किस सीमा तक पड़ता है।
मामले में अदालत को यह भी विचार करना पड़ सकता है कि अनुच्छेद 164(4) के तहत छह महीने की अवधि व्यक्ति की लगातार मंत्री पद पर रहने की अवधि से जुड़ी है या पहली नियुक्ति से उत्पन्न संवैधानिक सीमा को बाद की पुनर्नियुक्ति से समाप्त नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का आगामी निर्णय राज्य मंत्रिपरिषद में गैर-विधायकों की नियुक्ति और उनके पुनर्नियुक्त होने की संवैधानिक सीमाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
