एनजीटी का बड़ा आदेश: हमीरपुर रेत खनन डीएसआर का होगा पुनर्मूल्यांकन, रिप्लेनिशमेंट स्टडी को बताया अनिवार्य

NGT - National Green Tribunal

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में रेत खनन से जुड़े जिला सर्वेक्षण प्रतिवेदन (District Survey Report-DSR) को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया है कि नदी तंत्र और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए “रिप्लेनिशमेंट स्टडी” (Replenishment Study) केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वैध डीएसआर का अभिन्न और अनिवार्य हिस्सा है। हालांकि अधिकरण ने हमीरपुर की वर्ष 2024 की डीएसआर को तत्काल निरस्त नहीं किया, लेकिन राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) और राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) को इसे पुनः परीक्षण और पुनर्मूल्यांकन करने का निर्देश दिया है।

मामला विनय श्रीवास्तव और अमित कुमार यादव द्वारा दायर दो मूल आवेदनों से जुड़ा था, जिनमें हमीरपुर जिले की 2024 की डीएसआर तथा रेत खनन के लिए जारी निविदा प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि डीएसआर को सतत रेत खनन एवं प्रबंधन दिशा-निर्देश, 2016 (SSMG-2016) और रेत खनन प्रवर्तन एवं निगरानी दिशा-निर्देश, 2020 (EMGSM-2020) के अनुरूप तैयार नहीं किया गया। उनका मुख्य तर्क था कि डीएसआर को मंजूरी दिए जाने से पहले आवश्यक रिप्लेनिशमेंट स्टडी न तो की गई थी और न ही उसे SEIAA के समक्ष रखा गया था।

एनजीटी ने अपने विस्तृत आदेश में रेत खनन के पर्यावरणीय प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। अधिकरण ने कहा कि अनियंत्रित रेत खनन नदी की प्राकृतिक संरचना, जैव विविधता, तटीय क्षेत्रों और भूजल स्तर पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। आदेश में उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अवैध और अनियंत्रित रेत खनन न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही को भी कमजोर करता है।

अधिकरण ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत जारी ईआईए अधिसूचना, 2006, उसके 2016 संशोधन, SSMG-2016 और EMGSM-2020 का विश्लेषण करते हुए कहा कि डीएसआर किसी भी रेत खनन परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति का मूल आधार होता है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि किन क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी जा सकती है, किन क्षेत्रों में प्रतिबंध आवश्यक है और नदी में प्रतिवर्ष जमा होने वाली रेत की वास्तविक मात्रा कितनी है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि हमीरपुर डीएसआर को अक्टूबर 2024 में मंजूरी मिल गई थी, जबकि रिप्लेनिशमेंट स्टडी मार्च 2025 में पहली बार SEAC को भेजी गई। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि 6 मार्च 2025 को SEIAA और SEAC की संयुक्त बैठक में कई जिलों की डीएसआर को इसलिए रोक दिया गया था क्योंकि संबंधित रिप्लेनिशमेंट स्टडी उपलब्ध नहीं कराई गई थी। हमीरपुर भी उन जिलों में शामिल था।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार और SEIAA का कहना था कि रिप्लेनिशमेंट स्टडी वर्ष 2023 में तैयार की जा चुकी थी और उसका डेटा डीएसआर तैयार करते समय उपयोग में लिया गया था। उनका तर्क था कि अध्ययन की पूरी रिपोर्ट का डीएसआर में शामिल होना आवश्यक नहीं है, बल्कि उसके निष्कर्षों पर आधारित आंकड़ों का उपयोग पर्याप्त है।

रिकॉर्ड की जांच के बाद एनजीटी ने पाया कि रिप्लेनिशमेंट स्टडी की रिपोर्ट वास्तव में 11 मार्च 2025 को पहली बार SEIAA के समक्ष प्रस्तुत की गई, जबकि डीएसआर को 25 अक्टूबर 2024 को ही मंजूरी मिल चुकी थी। अधिकरण ने कहा कि इससे यह स्पष्ट होता है कि डीएसआर को मंजूरी देते समय SEIAA के पास पूरी रिप्लेनिशमेंट स्टडी उपलब्ध नहीं थी।

अधिकरण ने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों, विशेषकर Union Territory of Jammu & Kashmir v. Raja Muzaffar Bhat तथा State of Uttar Pradesh v. Gaurav Kumar का उल्लेख करते हुए कहा कि “उचित रिप्लेनिशमेंट स्टडी के बिना डीएसआर वैध और टिकाऊ नहीं माना जा सकता” तथा “रिप्लेनिशमेंट रिपोर्ट डीएसआर का अभिन्न हिस्सा है।” न्यायाधिकरण ने यह भी रेखांकित किया कि डीएसआर “सेमिनल इम्पोर्टेंस” अर्थात अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है और इसकी जांच पूरी सावधानी तथा स्वतंत्र पर्यावरणीय मूल्यांकन के साथ की जानी चाहिए।

हालांकि एनजीटी ने डीएसआर को तत्काल रद्द करने से इनकार कर दिया। अधिकरण ने माना कि रिप्लेनिशमेंट स्टडी का कुछ डेटा डीएसआर में शामिल था और सर्वोच्च न्यायालय का वह निर्णय, जिसमें रिप्लेनिशमेंट स्टडी को डीएसआर का अभिन्न हिस्सा घोषित किया गया, डीएसआर की मंजूरी के बाद आया था। इसलिए न्यायाधिकरण ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए SEAC और SEIAA को हमीरपुर डीएसआर का पुनर्मूल्यांकन करने का निर्देश दिया।

एनजीटी ने यह भी कहा कि पुनर्मूल्यांकन के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि नदी के जलमग्न क्षेत्रों में खनन की अनुमति न दी गई हो, केवल अनुमत सीमा तक ही खनिज निकासी हो और EMGSM-2020 के सभी प्रावधानों का पालन किया जाए। इसके अतिरिक्त, रिप्लेनिशमेंट स्टडी में वर्ष 2024 के वर्षा संबंधी आंकड़ों के उल्लेख को लेकर उठाए गए विवाद की भी जांच की जाएगी।

यह आदेश पूरे देश में रेत खनन परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि पर्यावरणीय स्वीकृति केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन, सार्वजनिक भागीदारी और पारदर्शी मूल्यांकन पर आधारित होनी चाहिए। निर्णय का प्रभाव उन सभी जिलों पर पड़ सकता है जहां डीएसआर तैयार करने या स्वीकृत करने की प्रक्रिया में रिप्लेनिशमेंट स्टडी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश नदी पारिस्थितिकी की सुरक्षा और टिकाऊ खनन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।