डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) सख्त, साइबर ठगी को मानवाधिकारों के लिए गंभीर खतरा बताया

National Human Rights Commission

देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट घोटालों और साइबर ठगी के मामलों को मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने बुधवार को नई दिल्ली स्थित मानव अधिकार भवन में ‘डिजिटल अरेस्ट स्कैम से मानवाधिकारों की सुरक्षा’ विषय पर एक खुली चर्चा (ओपन हाउस डिस्कशन) आयोजित की। इस दौरान आयोग ने डिजिटल धोखाधड़ी से प्रभावित लोगों की सुरक्षा, राहत और मुआवजे की व्यवस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए Justice V. Ramasubramanian ने कहा कि साइबर अपराधियों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों का भय दिखाकर लोगों से धन ऐंठने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के आंकड़ों के अनुसार पिछले छह वर्षों में भारतीय नागरिकों को साइबर धोखाधड़ी के कारण लगभग 52,976 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जिसमें करीब 8 प्रतिशत नुकसान डिजिटल अरेस्ट घोटालों से जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को अपनी राशि वापस पाने के लिए लंबी, महंगी और मानसिक रूप से थकाने वाली कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार धन गंवाने की तुलना में उसकी वसूली की प्रक्रिया अधिक कष्टदायक साबित होती है। उन्होंने देश में बड़ी संख्या में मौजूद ‘म्यूल अकाउंट्स’ पर भी चिंता जताई, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को इधर-उधर स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है।

आयोग के सदस्य Justice (Dr.) Bidyut Ranjan Sarangi ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी से निपटने के लिए मौजूदा तंत्र में कई खामियां हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। वहीं सदस्य Vijaya Bharathi Sayani ने कहा कि नागरिकों को साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी से बचाना सुशासन का महत्वपूर्ण दायित्व है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति ऐसे अपराधों का शिकार न बने।

एनएचआरसी के महासचिव Bharat Lal ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों का सबसे अधिक असर वरिष्ठ नागरिकों, सेवानिवृत्त अधिकारियों, पेशेवरों, उद्योगपतियों और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोगों पर पड़ रहा है। इससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि उनकी गरिमा, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष ही वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाकर किए गए ऐसे 3,000 से अधिक मामलों की सूचना सामने आई थी।

चर्चा के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), दूरसंचार विभाग, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI), राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI), बैंकिंग एवं फिनटेक क्षेत्र के प्रतिनिधियों और साइबर विशेषज्ञों ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों से निपटने के लिए कई सुझाव दिए।

विशेषज्ञों ने डिजिटल अरेस्ट को एक अलग अपराध के रूप में कानूनी मान्यता देने, म्यूल अकाउंट किराए पर देने और सरकारी प्रतीकों के दुरुपयोग को स्पष्ट रूप से दंडनीय बनाने, संदिग्ध लेनदेन पर स्वचालित ‘सर्किट ब्रेकर’ लागू करने, पीड़ितों के लिए त्वरित मुआवजा और सहायता तंत्र विकसित करने तथा लंबी ऑनलाइन कॉल्स के दौरान चेतावनी संदेश जारी करने जैसे उपाय सुझाए।

बैठक में यह भी सुझाव दिया गया कि नागरिकों को सरकारी एजेंसियों के नाम पर आने वाले संदेशों, नोटिसों और कॉल्स की सत्यता जांचने के लिए एक एकीकृत सरकारी सत्यापन पोर्टल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डीपफेक और सिंथेटिक पहचान जैसी उभरती तकनीकों के दुरुपयोग को रोकने के लिए विशेष सुरक्षा उपाय विकसित किए जाएं।

चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने वरिष्ठ नागरिकों और अन्य संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ बेहतर सहयोग, पीड़ितों की मनोवैज्ञानिक सहायता और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रशिक्षण को भी आवश्यक बताया।

एनएचआरसी ने कहा कि चर्चा के दौरान प्राप्त सुझावों पर आगे विचार-विमर्श किया जाएगा और इसके आधार पर केंद्र तथा राज्य सरकारों को विस्तृत सिफारिशें भेजी जाएंगी, ताकि डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते खतरे से नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा की प्रभावी रक्षा की जा सके।