रायपुर स्थित कमर्शियल कोर्ट (डिस्ट्रिक्ट जज स्तर) ने एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक विवाद में राजदेव स्टील्स एंड अलॉयज प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश की फर्म बावा अप्लायंसेज को 63.60 लाख रुपये का बकाया भुगतान करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि उक्त राशि पर वाद लंबित रहने की अवधि के लिए 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा डिक्री पारित होने के बाद भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।
न्यायाधीश पंकज शर्मा की अदालत ने 5 मई 2026 को पारित अपने फैसले में माना कि राजदेव स्टील्स ने पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्यों के माध्यम से यह साबित कर दिया है कि उसने बावा अप्लायंसेज को स्पंज आयरन लंप्स और स्पंज आयरन फाइन्स की आपूर्ति की थी तथा उसके बदले देय राशि का पूरा भुगतान नहीं किया गया।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, मई 2022 से जून 2022 के बीच राजदेव स्टील्स ने बावा अप्लायंसेज को कुल 613.070 मीट्रिक टन स्पंज आयरन सामग्री की आपूर्ति की थी। इन आपूर्तियों के लिए कुल 2.57 करोड़ रुपये से अधिक के बिल जारी किए गए थे। कंपनी का दावा था कि प्रतिवादी ने 1.75 करोड़ रुपये का आंशिक भुगतान किया और कुछ सामग्री वापस भी की, लेकिन सभी समायोजनों के बाद 63.60 लाख रुपये की राशि बकाया रह गई।
मामले की सुनवाई के दौरान बावा अप्लायंसेज ने प्रारंभिक स्तर पर लिखित जवाब प्रस्तुत किया, लेकिन बाद में न्यायालय में उपस्थित होना बंद कर दिया। इसके बाद अदालत ने उसके विरुद्ध एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्यवाही की। अपने जवाब में प्रतिवादी ने दावा किया था कि विवादित सामग्री किसी अन्य कंपनी को आपूर्ति की गई थी और उसके नाम पर जारी किए गए चालान फर्जी और मनगढ़ंत हैं।
हालांकि अदालत ने पाया कि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय ने कहा कि केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धोखाधड़ी या दस्तावेजों की जालसाजी जैसे गंभीर आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ सिद्ध करना आवश्यक होता है।
फैसले में अदालत ने विशेष रूप से कर चालानों, ई-वे बिलों, लेजर खातों और बैंक विवरणों को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। न्यायालय ने कहा कि वाणिज्यिक लेनदेन में विधिवत प्रमाणित चालान, परिवहन संबंधी दस्तावेज और लेखा अभिलेख आपूर्ति और देयता साबित करने के लिए पर्याप्त महत्व रखते हैं। अदालत ने यह भी माना कि प्रतिवादी द्वारा किए गए 1.75 करोड़ रुपये के आंशिक भुगतान स्वयं दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक संबंध और देनदारी की पुष्टि करते हैं।
न्यायालय ने सेल ऑफ गुड्स एक्ट, 1930 की धारा 31 और धारा 55 का हवाला देते हुए कहा कि खरीदार का दायित्व है कि वह अनुबंध के अनुसार वस्तुओं को स्वीकार करे और उनका भुगतान करे। यदि खरीदार भुगतान करने में विफल रहता है तो विक्रेता मूल्य की वसूली के लिए मुकदमा दायर कर सकता है।
बावा अप्लायंसेज ने यह भी तर्क दिया था कि यह विवाद कमर्शियल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि दो व्यावसायिक संस्थाओं के बीच माल की बिक्री और आपूर्ति से उत्पन्न विवाद स्पष्ट रूप से कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 2(1)(c) के अंतर्गत “वाणिज्यिक विवाद” की श्रेणी में आता है।
ब्याज की मांग पर अदालत ने पाया कि चालानों में 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का प्रावधान था, लेकिन उसकी भाषा अस्पष्ट थी और निर्धारित दर परिस्थितियों के अनुरूप अत्यधिक प्रतीत होती है। इसलिए अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 34 के तहत उचित ब्याज दर निर्धारित करते हुए 12 प्रतिशत वार्षिक पेंडेंटे लाइट ब्याज और 9 प्रतिशत वार्षिक भविष्यकालीन ब्याज देने का आदेश दिया।
इस निर्णय को वाणिज्यिक वसूली संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब चालान, ई-वे बिल, बैंक रिकॉर्ड और लेखा दस्तावेज आपूर्ति और बकाया राशि को प्रमाणित करते हों, तब बिना साक्ष्य के लगाए गए फर्जीवाड़े या अनुबंध न होने जैसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह फैसला व्यवसायिक संस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि माल प्राप्त करने और आंशिक भुगतान करने के बाद शेष राशि का भुगतान न करने पर उन्हें ब्याज और मुकदमे की लागत सहित भुगतान करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
