सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण (CESTAT) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राजस्व विभाग को सूरत की एक आवासीय सहकारी हाउसिंग सोसायटी को ₹71.55 लाख का पूरा सेवा कर (सर्विस टैक्स) रिफंड ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया है। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी या लेखा संबंधी त्रुटियों के आधार पर वैध रिफंड को रोका नहीं जा सकता।
मामला सूरत स्थित आशिर्वाद पैलेस आवासीय परिसर से जुड़ा था, जहां रखरखाव शुल्क पर सेवा कर की वसूली की गई थी। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने यह माना कि सदस्यों से प्राप्त रखरखाव शुल्क पर “म्यूचुअलिटी के सिद्धांत” के कारण सेवा कर लागू नहीं होता। इसके बाद सोसायटी ने ₹71.55 लाख की वापसी का दावा किया। हालांकि विभागीय प्राधिकरण ने केवल ₹36.11 लाख की राशि मंजूर की और शेष ₹35.44 लाख का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह राशि अलग सेवा कर पंजीकरण कोड के माध्यम से जमा की गई थी।
विभाग ने मंजूर की गई राशि के विरुद्ध भी अपील दायर करते हुए तर्क दिया कि रिफंड पर “अनुचित लाभ” (Unjust Enrichment) का सिद्धांत लागू होता है। दूसरी ओर, सोसायटी ने कहा कि आशिर्वाद पैलेस बिल्डिंग मेंटेनेंस और आशिर्वाद पैलेस कॉमन मेंटेनेंस वास्तव में एक ही आवासीय परिसर का हिस्सा हैं तथा विभाग ने स्वयं जांच और मांग की कार्यवाही के दौरान उन्हें एक इकाई के रूप में माना था।
न्यायिक सदस्य डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश ने अपने आदेश में कहा कि पूरा ₹71.55 लाख सरकारी खजाने में जमा होने का तथ्य निर्विवाद है। केवल अलग पंजीकरण कोड का उपयोग होने से करदाता के वैधानिक रिफंड अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। अधिकरण ने कहा, “तकनीकी लेखा त्रुटियां किसी करदाता के वैधानिक रिफंड अधिकार को समाप्त नहीं कर सकतीं।”
अधिकरण ने यह भी माना कि विभाग ने कर की मांग और वसूली के समय आशिर्वाद पैलेस को एक इकाई माना था, इसलिए रिफंड के समय उसे अलग-अलग संस्थाओं में बांटकर दावा अस्वीकार करना उचित नहीं है। फैसले में गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें कहा गया है कि यदि राशि सरकारी खाते में पहुंच चुकी है तो केवल गलत पंजीकरण संख्या या लेखा कोड के आधार पर लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
अनुचित लाभ के मुद्दे पर अधिकरण ने कहा कि जांच के दौरान जमा की गई राशि वस्तुतः “प्री-डिपॉजिट” की प्रकृति की थी। जब मूल सेवा कर मांग ही निरस्त हो चुकी है, तब उस राशि को कर मानकर अनुचित लाभ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। अधिकरण ने संविधान के अनुच्छेद 265 का उल्लेख करते हुए कहा कि “कानून के अधिकार के बिना राज्य किसी नागरिक का धन अपने पास नहीं रख सकता।”
फैसले में यह भी कहा गया कि जब सेवा कर की वसूली ही म्यूचुअलिटी सिद्धांत के कारण अवैध पाई गई, तब यह मानने का कोई आधार नहीं है कि सोसायटी ने कर का बोझ अपने सदस्यों पर डाल दिया था। इसलिए रिफंड पर अनुचित लाभ की रोक लागू नहीं होगी।
अंततः CESTAT ने आयुक्त (अपील) के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए राजस्व विभाग को ₹71.55 लाख की पूरी राशि लौटाने का निर्देश दिया। साथ ही ₹35.44 लाख की शेष राशि पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 35FF के तहत लागू ब्याज भी देने का आदेश दिया गया। यह निर्णय 18 जून 2026 को सुनाया गया।
