सरकारी जमीन पर मंदिर निर्माण के आरोप पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम आदेश, तहसीलदार को कानून के अनुसार फैसला करने के निर्देश

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेमेतरा में सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण और मंदिर निर्माण से जुड़े मामले में सीधे तोड़फोड़ या ध्वस्तीकरण का आदेश देने से इनकार करते हुए मामले को तहसीलदार के समक्ष लंबित वैधानिक कार्यवाही में भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और अनधिकृत निर्माण की वास्तविक स्थिति का निर्धारण सक्षम राजस्व अधिकारी द्वारा कानून के अनुसार किया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी प्रतिकूल आदेश या दंडात्मक कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति और प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।

यह आदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 21 अगस्त 2026 को रिट याचिका क्रमांक WPC No. 4681 of 2024 में पारित किया। याचिका बेमेतरा निवासी सुखनंदन दास जांगड़े ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी, नगर पालिका निगम बेमेतरा सहित अन्य अधिकारियों और राजेश निषाद के खिलाफ दायर की थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके मकान के सामने स्थित सरकारी जमीन पर राजेश निषाद ने कथित रूप से कब्जा कर मंदिर का निर्माण कराया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसके परिवार के नाम खसरा नंबर 649/3 की 0.019 हेक्टेयर भूमि दर्ज है। यह जमीन मुख्य सड़क से लगी हुई है और सड़क तथा उसकी जमीन के बीच दक्षिण दिशा में सरकारी जमीन स्थित है। आरोप लगाया गया कि इसी सरकारी भूमि पर दूसरे पक्ष ने बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया।

इस मामले में याचिकाकर्ता ने 28 मई 2024 को तहसीलदार, बेमेतरा के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर कथित अतिक्रमण हटाने और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। रिकॉर्ड के अनुसार, तहसीलदार ने मामले पर विचार करने के बाद 16 जुलाई 2024 को कथित अनधिकृत निर्माण को तत्काल रोकने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उक्त आदेश के बावजूद निर्माण कार्य जारी रखा गया और बाद में उसने पुलिस तथा अन्य संबंधित अधिकारियों के समक्ष भी कई आवेदन दिए, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2024 को निर्माण की तत्कालीन स्थिति के संबंध में पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि इसके बावजूद निर्माण किए जाने के कारण उसने अवमानना याचिका भी दायर की, जो हाईकोर्ट में लंबित है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत तहसीलदार के समक्ष कार्यवाही पहले से चल रही है। इसलिए याचिकाकर्ता को उसी वैधानिक प्रक्रिया में अपनी शिकायत रखने और सक्षम राजस्व अधिकारी के निर्णय की प्रतीक्षा करने की बात कही गई।

सार्वजनिक जमीन पर धार्मिक निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India vs. State of Gujarat and Others मामले में दिए गए निर्देशों का उल्लेख किया। वर्ष 2011 के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों, सार्वजनिक पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा या अन्य धार्मिक स्वरूप के अनधिकृत निर्माण को रोकने पर जोर दिया था। पहले से मौजूद ऐसे निर्माणों की स्थिति की समीक्षा कर उचित कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णय Vinod Soni and Others vs. Rajesh Kumar Sahu and Others का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सार्वजनिक जमीन पर मंदिर निर्माण के संबंध में कोर्ट ने कहा था, “No person can be permitted to set up a temple on public land.” यानी किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जमीन पर मंदिर स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि धार्मिक या आध्यात्मिक भावना के आधार पर सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जे को वैध नहीं बनाया जा सकता। कानून का शासन सभी पर समान रूप से लागू होता है और धार्मिक स्वरूप का दावा किसी अवैध कब्जे को कानूनी संरक्षण नहीं देता।

बिना प्रक्रिया अपनाए नहीं होगी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के In Re: Directions in the Matter of Demolition of Structures फैसले का भी उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनधिकृत निर्माणों को गिराने से पहले अधिकारियों के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की है।

इसके तहत संबंधित व्यक्ति को पहले शो-कॉज नोटिस दिया जाना चाहिए। नोटिस में कथित अनधिकृत निर्माण, उल्लंघन के आधार, आवश्यक दस्तावेज और व्यक्तिगत सुनवाई की तारीख जैसी जानकारी होनी चाहिए। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के बाद ही सक्षम अधिकारी अंतिम और कारणयुक्त आदेश पारित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया यह भी स्पष्ट करती है कि यदि किसी निर्माण को गिराना आवश्यक माना जाता है तो अधिकारी को यह बताना होगा कि ध्वस्तीकरण ही अंतिम विकल्प क्यों है और निर्माण को नियमित करने, कंपाउंडिंग या केवल अवैध हिस्से को हटाने जैसे विकल्प क्यों उपलब्ध नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश क्यों नहीं दिया?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत तहसीलदार के समक्ष कार्यवाही पहले से लंबित है। इसलिए हाईकोर्ट के लिए इस स्तर पर खुद यह तय करना उचित नहीं होगा कि वास्तव में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है या निर्माण अनधिकृत है।

कोर्ट ने कहा कि तहसीलदार के समक्ष चल रही कार्यवाही ही इस विवाद के तथ्यात्मक और कानूनी पहलुओं की जांच के लिए उपयुक्त वैधानिक प्रक्रिया है। इसलिए याचिकाकर्ता को उसी कार्यवाही में अपना पक्ष रखने के लिए भेजा गया है।

हाईकोर्ट ने तहसीलदार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की शिकायत और उपलब्ध सभी संबंधित दस्तावेजों पर विचार करे और कानून के अनुसार यह तय करे कि संबंधित व्यक्ति ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया है या नहीं तथा वहां अनधिकृत निर्माण किया गया है या नहीं।

यदि तहसीलदार यह निष्कर्ष निकालता है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ है और अनधिकृत निर्माण किया गया है, तो उसे कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करनी होगी और कारणयुक्त एवं स्पष्ट आदेश पारित करना होगा।

संबंधित पक्ष को सुनवाई का अधिकार

हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया कि किसी प्रतिकूल आदेश या coercive action से पहले संबंधित व्यक्ति और उन सभी हितधारकों को सुनवाई का अवसर दिया जाए, जिनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। कार्रवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ध्वस्तीकरण संबंधी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का भी पालन करना होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि तहसीलदार के समक्ष कार्यवाही को कानूनी बाधा न होने की स्थिति में उचित समय के भीतर यथासंभव शीघ्र पूरा किया जाए।

हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी

इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया कि वास्तव में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ है या मंदिर का निर्माण अवैध है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने “अतिक्रमण या अनधिकृत निर्माण के आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।” अंतिम निर्णय तहसीलदार द्वारा उपलब्ध सामग्री और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।

इस प्रकार हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए विवाद को सक्षम राजस्व अधिकारी के समक्ष लंबित कार्यवाही में भेज दिया। आदेश का व्यापक महत्व यह है कि सार्वजनिक या सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण के मामलों में प्रशासन को कानून के तहत कार्रवाई करनी होगी, लेकिन किसी निर्माण को हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी पालन करना आवश्यक होगा।