नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ जिला एवं सत्र न्यायालय के पास बने करीब 72 कथित अवैध वकील चैंबरों को गिराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने की मांग भी खारिज कर दी। अदालत ने संबंधित वकीलों से अवैध निर्माणों को शांतिपूर्वक खाली करने की सलाह दी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन में पद पर होना सार्वजनिक जमीन या अदालत परिसर में किए गए अतिक्रमण को उचित ठहराने का आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत परिसर के भीतर सड़कों और खुले स्थानों पर अतिक्रमण की अनुमति नहीं दी जा सकती और ऐसे सभी अवैध निर्माणों को हटाना होगा।
न्यायमूर्ति नाथ ने उत्तर प्रदेश में अपने करीब दो वर्ष के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं देखा है कि इस तरह के अवैध निर्माण सड़कों को बाधित करते हैं और यातायात की समस्या पैदा करते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने वकीलों के लिए किसी वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था किए जाने का सुझाव दिया, लेकिन पीठ ने कहा कि वकील अलग से जमीन हासिल कर सकते हैं या जमीन उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार से सहायता मांग सकते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा करके चैंबर बनाए रखना उचित नहीं है।
जब सुनवाई के दौरान विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया गया, तो न्यायमूर्ति नाथ ने इसे स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने भी सवाल उठाया कि यदि वकील ही अदालत परिसर में अतिक्रमण करेंगे तो परिसर की सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन निभाएगा। उन्होंने राजस्थान के एक जिला न्यायालय के दौरे का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां एक वकील द्वारा जिला न्यायाधीशों के लिए निर्धारित पार्किंग स्थान को कथित तौर पर चैंबर के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई थी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन निर्देशों को चुनौती देने के बाद आया, जिनमें लखनऊ जिला एवं सत्र न्यायालय के आसपास मौजूद अवैध निर्माणों को हटाने का आदेश दिया गया था। हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम को अतिक्रमण हटाने का निर्देश देते हुए कहा था कि कार्रवाई रविवार को की जाए, ताकि न्यायिक कार्य प्रभावित न हो। अदालत ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि वकील या उनके सहयोगी कार्रवाई में बाधा डालते हैं तो उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने संबंधित 72 कब्जाधारियों को निर्माण खाली करने या अपने कब्जे का वैध आधार प्रस्तुत करने का एक और अवसर देने का भी निर्देश दिया था। इससे पहले लखनऊ के कैसरबाग क्षेत्र में अवैध चैंबर हटाने की कार्रवाई के दौरान मई में वकीलों और उत्तर प्रदेश पुलिस के बीच झड़प की घटना सामने आई थी, जिसके बाद मामला और गंभीर हो गया था।
लखनऊ नगर निगम ने बाद में हाईकोर्ट को बताया था कि 100 से अधिक अवैध चैंबर हटाए जा चुके हैं। हालांकि, जिन 72 चैंबरों या दुकानों के खिलाफ शुरुआत में नोटिस जारी किए गए थे, उनमें से केवल 14 को हटाया गया था और कुछ स्थानों पर दोबारा अतिक्रमण किए जाने की बात भी सामने आई थी।
इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ के पुलिस आयुक्त, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को आपसी समन्वय के साथ कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। अदालत ने अधिकारियों से यह भी कहा था कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने नहीं दी जाए। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इनकार के बाद लखनऊ में चिन्हित अवैध चैंबरों के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।
