छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DySP) को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (Additional SP) के पद पर पोस्टिंग के लिए निर्धारित 15 अंकों के न्यूनतम बेंचमार्क को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्धारित सेवा अवधि और अन्य पात्रता शर्तें पूरी करने से किसी पुलिस अधिकारी को उच्च पद पर पोस्टिंग का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। अधिकारी को केवल विचार किए जाने का अधिकार मिलता है, जबकि उसकी उपयुक्तता का अंतिम आकलन विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) द्वारा किया जा सकता है। यह फैसला माधुरी धिरही बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, WPS No. 4177 of 2026, 2026:CGHC:38195 (AFR) में जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने 25 अगस्त 2026 को सुनाया।
मामले में याचिकाकर्ता माधुरी धिरही वर्ष 2014 बैच की सीधे भर्ती हुई डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस थीं और सीनियर स्केल में कार्यरत थीं। उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर विचार के लिए आवश्यक आठ वर्ष की अर्हकारी सेवा पूरी कर ली थी। उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ पुलिस एग्जीक्यूटिव (Gazetted) सर्विस रिक्रूटमेंट एंड प्रमोशन रूल्स, 2005 के नियम 23 और Schedule-V के तहत वह पोस्टिंग के लिए पात्र थीं। इसके बावजूद दिसंबर 2025 में DPC ने उन्हें अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद के लिए “Not Fit” घोषित कर दिया।
याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्ति DPC द्वारा निर्धारित 15 अंकों के न्यूनतम बेंचमार्क को लेकर थी। उनके सर्विस रिकॉर्ड में पिछले वर्षों के ACR में चार “Very Good” और एक “Good” ग्रेडिंग थी। उनके अनुसार निर्धारित ग्रेडिंग प्रणाली के तहत “Very Good” के लिए तीन अंक और “Good” के लिए दो अंक मिलते थे, जिससे उनके कुल 14 अंक बनते थे। उनका तर्क था कि 15 अंकों का बेंचमार्क तय करने का कोई स्पष्ट प्रावधान 2005 के नियमों में नहीं है और इस तरह DPC ने नियमों से बाहर जाकर अतिरिक्त कसौटी निर्धारित की।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पांच वर्षों के मूल्यांकन में 15 अंकों की अनिवार्यता व्यवहारिक रूप से प्रत्येक वर्ष “Very Good” स्तर की उपलब्धि की मांग करती है। उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार के 5 सितंबर 1974 के एक सर्कुलर का भी हवाला दिया, जिसमें “Good” के लिए 8 से 12 अंकों का बेंचमार्क बताए जाने की बात कही गई। साथ ही, पूर्व वर्षों 2014 से 2017 के दौरान DPC द्वारा न्यूनतम 10 अंक निर्धारित किए जाने का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता ने इस आधार पर 15 अंकों की नई कसौटी को मनमाना बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का दावा किया।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त या पोस्ट किए जाने का कोई निहित अधिकार नहीं है। उनके पास केवल विचार किए जाने का अधिकार है। सरकार के अनुसार DPC एक विशेषज्ञ निकाय है, जिसे अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड और ACR के आधार पर उनकी उपयुक्तता का आकलन करने का अधिकार है। राज्य ने यह भी कहा कि 15 अंकों का बेंचमार्क सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया था और इसे DPC ने पद की जिम्मेदारियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया था।
इस मामले में हाईकोर्ट ने 29 जुलाई 2026 के आदेश के माध्यम से अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (Administration) से शपथपत्र दाखिल कर यह बताने को कहा था कि DySP से Additional SP के पद पर पोस्टिंग के लिए 15 अंकों का बेंचमार्क किस आधार पर निर्धारित किया गया। इसके बाद दाखिल शपथपत्र में राज्य की ओर से बताया गया कि DPC ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद की प्रकृति, जिम्मेदारियों और आवश्यकताओं के साथ-साथ पात्र अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड और ACR का मूल्यांकन करने के बाद 15 अंक का न्यूनतम मानक तय किया था।
हाईकोर्ट ने Rule 23 का परीक्षण करते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत सीनियर स्केल, सिलेक्शन ग्रेड या सीनियर सिलेक्शन ग्रेड में कार्यरत और निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले अधिकारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक या समकक्ष पद के लिए विचार किए जाने के पात्र हैं। हालांकि, पात्रता अपने आप उच्च पद पर पोस्टिंग का अधिकार नहीं देती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया, “किसी अधिकारी को पोस्टिंग के लिए विचार किए जाने का अधिकार है, लेकिन उसे नियुक्ति या पोस्टिंग का कोई निहित या अपरिवर्तनीय अधिकार प्राप्त नहीं होता।”
फैसले में विभागीय पदोन्नति समिति की भूमिका और उसके मूल्यांकन में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पर भी विस्तार से चर्चा की गई। कोर्ट ने कहा कि DPC एक विशेषज्ञ निकाय है और वह अधिकारियों की उपयुक्तता का आकलन करते समय उनके पूरे सर्विस रिकॉर्ड तथा ACR का समग्र मूल्यांकन कर सकती है। अदालत सामान्यतः DPC के आकलन पर अपीलीय प्राधिकारी की तरह बैठकर अपना मूल्यांकन उसके स्थान पर नहीं रख सकती।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India v. A.K. Narula, (2007) 11 SCC 10 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि DPC को उम्मीदवारों का मूल्यांकन समान मानकों और कसौटियों के आधार पर करने की स्वतंत्रता है। यदि मूल्यांकन की प्रक्रिया पक्षपात, दुर्भावना या मनमानी से प्रभावित हो, तभी न्यायिक हस्तक्षेप का आधार बनता है।
इसी तरह B.V. Sivaiah & Ors. v. K. Addanki Babu & Ors., (1998) 6 SCC 720 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी प्रशासनिक दक्षता के लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यता का मानक तय कर सकता है और सर्विस रिकॉर्ड या अन्य निर्धारित माध्यमों से मूल्यांकन करते हुए न्यूनतम अंक निर्धारित कर सकता है।
हाईकोर्ट ने Dalpat Abasaheb Solunke v. B.S. Mahajan, (1990) 1 SCC 305 के फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अदालतों को चयन समिति के निर्णय के विरुद्ध अपीलीय प्राधिकारी की तरह उम्मीदवारों की योग्यता की दोबारा जांच नहीं करनी चाहिए। चयन समिति के निर्णय में हस्तक्षेप केवल सीमित परिस्थितियों में किया जा सकता है, जैसे नियमों का उल्लंघन, चयन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता या चयन को प्रभावित करने वाली सिद्ध दुर्भावना।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि DPC की बैठक की कार्यवाही में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर पोस्टिंग के लिए न्यूनतम कसौटी “Good” और कम से कम 15 अंक होगी। इसके बाद याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड और ACR का मूल्यांकन किया गया और उन्हें 14 अंक मिले। इस कारण वह निर्धारित न्यूनतम सीमा पूरी नहीं कर सकीं।
कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता की अपनी गणना के अनुसार ACR ग्रेडिंग से 14 अंक बनते हैं, DPC द्वारा तय 15 अंकों का बेंचमार्क मनमाना नहीं माना जा सकता। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या DPC को न्यूनतम मानक निर्धारित करने का अधिकार था और क्या उसे सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकीं कि 15 अंकों की कसौटी उनके खिलाफ अलग तरीके से लागू की गई थी, समान स्थिति वाले किसी अन्य अधिकारी को अलग लाभ दिया गया था या DPC का निर्णय दुर्भावना, पक्षपात अथवा मनमानी से प्रभावित था। इसलिए कोर्ट को Article 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला।
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पात्रता और उपयुक्तता के बीच अंतर है। हाईकोर्ट ने माना कि किसी अधिकारी द्वारा निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर लेना और नियमों के तहत पात्र हो जाना उसे केवल विचार के दायरे में लाता है। इसके बाद संबंधित अधिकारी की उपयुक्तता का मूल्यांकन DPC कर सकती है। कोर्ट ने कहा, “विचार के लिए पात्रता और पोस्टिंग के लिए उपयुक्तता अलग-अलग अवधारणाएं हैं।”
इस फैसले का पुलिस अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति एवं पोस्टिंग से जुड़े मामलों पर व्यापक महत्व हो सकता है। निर्णय यह स्पष्ट करता है कि DPC विशेषज्ञ निकाय के रूप में उपयुक्तता तय करने के लिए उचित न्यूनतम मानक निर्धारित कर सकती है, लेकिन यह विवेक असीमित नहीं है। बेंचमार्क लागू नियमों के अनुरूप होना चाहिए और सभी समान रूप से स्थित अधिकारियों पर समान तरीके से लागू किया जाना चाहिए। यदि निर्णय मनमाना, भेदभावपूर्ण, पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो न्यायिक समीक्षा के तहत उसमें हस्तक्षेप संभव है।
अंततः छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने WPS No. 4177 of 2026 को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट का निष्कर्ष रहा कि 14 अंक प्राप्त करने वाली याचिकाकर्ता 15 अंकों के न्यूनतम बेंचमार्क को पूरा नहीं करती थीं और DPC के निर्णय में ऐसा कोई कानूनी दोष नहीं दिखा, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जा सके
