बिना सहमति सरकारी कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति पर भेजना कानूनन गलत, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला

JUSTICE RAKESH MOHAN PANDEY, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी या सरकारी सेवक को उसकी सहमति के बिना प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर नहीं भेजा जा सकता। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने दंतेवाड़ा में पदस्थ डिप्टी रेंजर सोहन लाल वर्मा की याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिनियुक्ति और उन्हें रिलीव करने से संबंधित 13 अप्रैल 2022 के दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में कर्मचारी की सहमति नहीं ली गई थी और न ही उधार लेने वाले तथा मूल विभाग के बीच किसी सहमति आधारित व्यवस्था का कोई ठोस आधार सामने आया।

मामला हाईकोर्ट में WPS No. 2815 of 2022 के रूप में सामने आया था। याचिकाकर्ता सोहन लाल वर्मा दंतेवाड़ा वन मंडल में डिप्टी रेंजर के पद पर कार्यरत थे। उन्हें 1 जनवरी 2022 के आदेश से डिप्टी रेंज ऑफिसर के पद पर पदोन्नति दी गई थी। इसके बाद 20 जनवरी 2022 को उन्हें वन मंडल दंतेवाड़ा से जिला यूनियन बीजापुर में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। बाद में 1 फरवरी 2022 को इस आदेश में संशोधन करते हुए उन्हें जिला यूनियन बीजापुर के स्थान पर जिला यूनियन दंतेवाड़ा भेज दिया गया। इसके बाद 13 अप्रैल 2022 को फिर आदेश संशोधित किया गया और उन्हें जिला यूनियन सुकमा में प्रतिनियुक्ति पर भेजते हुए उसी दिन जिला यूनियन दंतेवाड़ा से रिलीव कर दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सोमकांत वर्मा ने दलील दी कि उन्हें उनकी सहमति लिए बिना नई जगह पर प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। उनका यह भी कहना था कि अंतिम आदेश के माध्यम से उन्हें जिले से बाहर स्थानांतरित किया गया, जबकि 1 फरवरी 2022 के आदेश के बाद उन्होंने दंतेवाड़ा में अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल 2022 को उनके पक्ष में अंतरिम आदेश पारित किया था, जो मामले की सुनवाई के दौरान प्रभावी रहा।

राज्य सरकार की ओर से पेश पैनल लॉयर अजय कुमरानी ने याचिका का विरोध किया। राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि Fundamental Rule 110 के तहत कर्मचारी की सहमति लेना आवश्यक नहीं था। हालांकि, राज्य ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि याचिकाकर्ता अब भी जिला यूनियन दंतेवाड़ा में कार्यरत था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति की कानूनी प्रकृति पर विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिनियुक्ति सामान्य स्थानांतरण से अलग व्यवस्था है। इसमें कर्मचारी को उसके मूल कैडर या विभाग से बाहर किसी अन्य विभाग, कैडर या संस्था में अस्थायी रूप से सेवाएं देने के लिए भेजा जाता है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के State of Punjab v. Inder Singh मामले में प्रतिपादित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा, “There can be no deputation without the consent of the person so deputed.” यानी जिस कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाना है, उसकी सहमति के बिना वैध प्रतिनियुक्ति नहीं हो सकती।

कोर्ट ने Umapati Choudhary v. State of Bihar के फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले के अनुसार प्रतिनियुक्ति मूल विभाग या lending authority, कर्मचारी को लेने वाले विभाग या borrowing authority और स्वयं कर्मचारी के बीच एक सहमति आधारित व्यवस्था होती है। हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि प्रतिनियुक्ति की प्रकृति ही ऐसी है कि इसमें संबंधित कर्मचारी की सहमति भी आवश्यक तत्व है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India v. S.N. Maity मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि प्रतिनियुक्ति या सेवा संबंधी अधिकारों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने उस निर्णय में व्यक्त सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कहा कि केवल “until further orders” जैसे शब्द किसी नियोक्ता को मनमाने तरीके से कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देते। किसी सेवा व्यवस्था में बदलाव के पीछे उचित आधार और तर्क होना चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले के तथ्यों पर इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता की प्रतिनियुक्ति के लिए उसकी सहमति नहीं ली गई थी। इसके अलावा रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण भी नहीं था, जिससे यह साबित हो कि मूल विभाग और जिस संस्था में कर्मचारी को भेजा गया था, उनके बीच प्रतिनियुक्ति को लेकर कोई सहमति आधारित व्यवस्था बनी थी। कोर्ट ने कहा, “There was neither any consent of the petitioner nor any material to show a consensual arrangement between the lending and borrowing authorities.”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 13 अप्रैल 2022 के प्रतिनियुक्ति आदेश और उससे संबंधित रिलीविंग आदेश को कानूनन गलत मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की प्रतिनियुक्ति का आधार ही वैध नहीं था, इसलिए संबंधित दोनों आदेश कायम नहीं रह सकते। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।

फैसले का व्यापक महत्व सरकारी सेवा में प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर है। आदेश यह रेखांकित करता है कि प्रतिनियुक्ति को महज प्रशासनिक स्थानांतरण के रूप में नहीं देखा जा सकता। जब किसी कर्मचारी को उसके मूल विभाग या कैडर से बाहर किसी अन्य संस्था या विभाग में सेवाएं देने के लिए भेजा जाता है, तो संबंधित पक्षों की सहमति और प्रतिनियुक्ति की वैधानिक प्रकृति महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि, इस फैसले में कोर्ट ने सामान्य स्थानांतरण के अधिकार पर कोई व्यापक निषेध नहीं लगाया है। निर्णय विशेष रूप से उस प्रतिनियुक्ति व्यवस्था से संबंधित है जिसमें कर्मचारी की सहमति और संबंधित प्राधिकारियों के बीच सहमति का अभाव पाया गया।

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ 13 अप्रैल 2022 को जारी प्रतिनियुक्ति और रिलीविंग आदेश प्रभावी नहीं रहेंगे। साथ ही कोर्ट ने पहले दिया गया अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया। आदेश 24 अगस्त 2026 को जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने पारित किया।