गांजा तस्करी मामले में तीन आरोपियों की 4 साल की सजा बरकरार, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपील खारिज की

JUSTICE NARENDRA KUMAR VYAS, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 39.9 किलोग्राम गांजा बरामदगी के मामले में दोषी ठहराए गए तीन आरोपियों को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने महज सील, सैंपलिंग, मालखाना रिकॉर्ड और एनडीपीएस एक्ट की धारा 52ए के कथित उल्लंघन के आधार पर दोषसिद्धि को गलत मानने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। अदालत ने तीनों आरोपियों को चार-चार साल के सश्रम कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा को उचित माना है।

यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने क्रिमिनल अपील नंबर 1788/2019 में 24 अगस्त 2026 को सुनाया। मामला महासमुंद जिले की विशेष एनडीपीएस अदालत के 20 नवंबर 2019 के फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन किया गया था और उसमें ऐसी कोई गंभीर कानूनी खामी या विकृति नहीं थी, जिसके आधार पर दोषसिद्धि में हस्तक्षेप किया जाए।

मामला 5 अप्रैल 2018 का है। अभियोजन के अनुसार महासमुंद में पुलिस और आरपीएफ की टीम होटल, ढाबा और रेलवे स्टेशन के आसपास जांच कर रही थी। इसी दौरान पुराने गुड्स गोदाम और जय अंबे धर्मकांटा के पास तीन युवक पीठ पर बैग लटकाए संदिग्ध परिस्थितियों में दिखाई दिए। पुलिस ने उन्हें रोककर पूछताछ की। अभियोजन के मुताबिक आरोपियों ने अपने बैग में गांजा होने की बात बताई और यह भी कहा कि वे इसे ओडिशा के जुनागढ़ से खरीदकर महासमुंद में अवैध बिक्री के लिए लाए थे।

पुलिस ने बैग खोलने पर भूरे रंग की चिपकने वाली टेप से लिपटे पैकेट बरामद किए। प्रारंभिक कार्रवाई में कुल 40 किलोग्राम गांजा बरामद होने की बात सामने आई थी। हाईकोर्ट के अंतिम रिकॉर्ड में आरोपियों के कब्जे से क्रमशः 15 किलोग्राम, 9.9 किलोग्राम और 15 किलोग्राम गांजा, यानी कुल 39.9 किलोग्राम गांजा दर्ज किया गया। बरामद पदार्थ की जांच के बाद उसे गांजा पाया गया। इसके बाद पुलिस ने अपराध क्रमांक 154/2018 दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई की।

जांच के दौरान जब्त गांजे से नमूने तैयार किए गए और उन्हें फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी, रायपुर भेजा गया। 19 अप्रैल 2018 की एफएसएल रिपोर्ट में नमूनों को गांजा होने की पुष्टि हुई। अभियोजन ने मामले में 13 गवाहों के बयान दर्ज कराए और बड़ी संख्या में दस्तावेज अदालत में पेश किए। आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करते हुए खुद को निर्दोष बताया और झूठे मामले में फंसाने का दावा किया।

हाईकोर्ट में आरोपियों की ओर से मुख्य आपत्ति नमूनों की सील और उनकी पहचान को लेकर थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि मालखाने में रखे नमूनों पर एक प्रकार की सील दर्ज थी, जबकि एफएसएल में भेजे गए नमूनों पर अलग सील का उल्लेख था। बचाव पक्ष के अनुसार इस अंतर से यह संदेह पैदा होता है कि एफएसएल में वही नमूने नहीं भेजे गए थे, जो आरोपियों से बरामद किए गए थे। इस आधार पर अभियोजन की पूरी बरामदगी और गांजे की पहचान पर संदेह जताया गया।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने मालखाना रजिस्टर और एफएसएल से संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि जब्त सामग्री और नमूनों को 5 अप्रैल 2018 को मालखाने में जमा किया गया था। तीन नमूने 7 अप्रैल 2018 को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए और उसी दिन एफएसएल ने उन्हें प्राप्त भी कर लिया। अदालत के अनुसार रिकॉर्ड में ऐसी कोई कड़ी नहीं मिली, जिससे नमूनों की कस्टडी में टूट या छेड़छाड़ का संदेह पैदा हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि नमूनों की नंबरिंग या सील से जुड़ी विसंगति को अकेले ऐसा आधार नहीं माना जा सकता, जिससे पूरी अभियोजन कहानी संदिग्ध हो जाए। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rizwan Khan बनाम State of Chhattisgarh मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें नमूने की नंबरिंग में क्लेरिकल गलती होने के बावजूद जब्त और एफएसएल भेजे गए नमूनों के बीच संबंध प्रमाणित होने पर अभियोजन मामले को स्वीकार किया गया था।

आरोपियों ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 52 और 52ए के अनुपालन पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि नमूने और इन्वेंट्री तैयार करने की प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामी हुई और एफएसएल जांच के लिए भेजे गए नमूने वैध तरीके से तैयार नहीं किए गए थे। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष तैयार किए गए नमूने और पुलिस द्वारा मौके पर तैयार किए गए नमूनों के बीच अंतर था।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद इन दलीलों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में भौतिक सत्यापन और अन्य निर्धारित कार्यवाही की गई थी। प्रत्येक बैग से नमूने तैयार किए गए, पंचनामा बनाया गया, तस्वीरें ली गईं तथा संबंधित दस्तावेजों पर सील और हस्ताक्षर किए गए। अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष जिरह के दौरान ऐसी कोई गंभीर प्रक्रिया संबंधी कमी साबित नहीं कर सका, जिससे पूरा अभियोजन मामला प्रभावित होता।

धारा 52ए के संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Bharat Aambale बनाम State of Chhattisgarh फैसले का हवाला दिया। अदालत ने इस सिद्धांत को दोहराया कि धारा 52ए की प्रक्रिया में कोई कमी सामने आने मात्र से हर मामले में स्वतः बरी करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत को पूरे साक्ष्य, बरामदगी, गवाहों की विश्वसनीयता और जब्त सामग्री से एफएसएल नमूनों तक की कस्टडी चेन को समग्र रूप से देखना होता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन ने जब्त गांजे और एफएसएल में जांचे गए नमूनों के बीच पर्याप्त संबंध स्थापित किया है। नमूना तैयार करने से संबंधित दस्तावेजों पर आरोपियों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान भी मौजूद थे। स्वतंत्र गवाहों में से कुछ गवाह मुकर गए थे, लेकिन उन्होंने दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार की। अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों में केवल स्वतंत्र गवाहों के पूरी तरह समर्थन में न होने से अभियोजन का मामला समाप्त नहीं हो जाता।

बचाव पक्ष ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि जब्त किए गए गांजे की पूरी मात्रा ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं की गई। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन ने एफएसएल रिपोर्ट के साथ नमूने पेश किए और साक्ष्यों से यह स्थापित किया गया कि वे नमूने उसी जब्त गांजे से संबंधित थे। इसलिए केवल भारी मात्रा में जब्त मुख्य सामग्री के न्यायालय में प्रस्तुत न होने को इस मामले में दोषसिद्धि के लिए घातक नहीं माना जा सकता।

सजा कम करने की मांग पर भी हाईकोर्ट ने आरोपियों को राहत नहीं दी। रिकॉर्ड के अनुसार तीनों आरोपी लगभग दो साल चार महीने तक जेल में रहे थे। बचाव पक्ष ने आग्रह किया कि उनकी सजा को पहले से बिताई गई हिरासत की अवधि तक सीमित कर दिया जाए। हाईकोर्ट ने इस मांग को ठुकराते हुए कहा कि बरामद मात्रा छोटी मात्रा से अधिक लेकिन वाणिज्यिक मात्रा से कम थी और संबंधित अपराध के लिए एनडीपीएस एक्ट में अधिकतम 10 वर्ष तक के कठोर कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।

अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने चार वर्ष की सजा देकर पहले ही अपेक्षाकृत नरम दृष्टिकोण अपनाया था। हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थों की तस्करी के सामाजिक प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि एनडीपीएस एक्ट की व्याख्या उसके उद्देश्य और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि नशीले पदार्थों का प्रसार समाज और विशेष रूप से युवाओं के लिए गंभीर समस्या है तथा इस तरह के अपराधों से सख्ती से निपटना आवश्यक है।

फैसले का व्यावहारिक महत्व यह है कि एनडीपीएस मामलों में सील, नमूना, मालखाना रिकॉर्ड या धारा 52ए की प्रक्रिया में सामने आने वाली हर विसंगति अपने आप दोषसिद्धि को खत्म नहीं करती। अदालत यह देखेगी कि कथित कमी के बावजूद क्या अभियोजन बरामदगी, नमूने की पहचान, कस्टडी चेन और फॉरेंसिक रिपोर्ट के जरिए अपराध को संदेह से परे साबित कर पाया है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि एनडीपीएस मामलों में प्रक्रियात्मक नियमों का पालन महत्वहीन है। गंभीर ऐसी कमी, जो जब्त पदार्थ की पहचान या कस्टडी की विश्वसनीयता पर वास्तविक संदेह पैदा करे, मामले के परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

अंततः छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्रिमिनल अपील को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया और महासमुंद विशेष न्यायालय द्वारा दी गई दोषसिद्धि तथा चार वर्ष की सजा को बरकरार रखा। तीनों आरोपियों के जमानत बांड निरस्त कर दिए गए हैं और उन्हें 8 अक्टूबर 2026 को संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें कानून के अनुसार पहले से हिरासत में बिताई अवधि का सेट-ऑफ मिलेगा। यदि आरोपी निर्धारित तिथि पर आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने और हाईकोर्ट को अनुपालन रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया है।