सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को बड़ा झटका देते हुए मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए उनके नामांकन पत्र को खारिज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को अस्वीकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों में संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक है और ऐसे मामलों का समाधान केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत दायर यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने माना कि यदि नामांकन पत्रों की अस्वीकृति को लेकर सीधे संवैधानिक अदालतों में चुनौती की अनुमति दी जाए तो चुनावी विवादों के निपटारे के लिए समानांतर व्यवस्था खड़ी हो जाएगी, जो संविधान की मंशा के विपरीत होगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन को यह स्वतंत्रता दी कि वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत चुनाव याचिका दायर कर अपने नामांकन की अस्वीकृति को चुनौती दे सकती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी कानूनी प्रश्न चुनाव याचिका में उठाए जा सकते हैं।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब रिटर्निंग अधिकारी अरविंद शर्मा ने 9 जून को नटराजन का नामांकन पत्र यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्होंने अपने फॉर्म-26 शपथपत्र में तेलंगाना की एक अदालत में लंबित निजी शिकायत का उल्लेख नहीं किया था, जबकि उन्हें उस मामले में समन प्राप्त हो चुका था।
नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि नामांकन खारिज करना कानून के विपरीत है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत केवल उन आपराधिक मामलों का खुलासा करना आवश्यक है जिनमें सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों। उनके अनुसार, संबंधित शिकायत में अभी तक संज्ञान नहीं लिया गया था और मामला पूर्व-संज्ञान चरण में था, इसलिए उसका खुलासा करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था।
सिंघवी ने अदालत को बताया कि तेलंगाना की यह निजी शिकायत मुख्य रूप से किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों से संबंधित है। नटराजन को केवल इस आधार पर पक्षकार बनाया गया कि उन्होंने कांग्रेस की तेलंगाना प्रभारी होने के नाते कथित मुख्य आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कथित घटना वर्ष 2022 की है, जबकि नटराजन को तेलंगाना प्रभारी वर्ष 2025 में बनाया गया था।
सुनवाई के दौरान सिंघवी ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की और इस बीच प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। उन्होंने मोहिंदर सिंह गिल और अशोक कुमार मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि असाधारण परिस्थितियों में अदालतें चुनावी प्रक्रिया को सुचारु बनाने के लिए हस्तक्षेप कर सकती हैं।
वहीं, प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए अनुच्छेद 32 का सहारा नहीं लिया जा सकता। उन्होंने एन.पी. पोनुस्वामी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नामांकन पत्र की स्वीकृति या अस्वीकृति से जुड़े विवाद केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही उठाए जा सकते हैं।
चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने भी कहा कि चुनावी विवादों के निपटारे का विशेष अधिकार कानून द्वारा चुनाव न्यायाधिकरणों को दिया गया है और चुनाव प्रक्रिया के बीच न तो चुनाव आयोग और न ही संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया और दोहराया कि मीन
