समान आरोप, अलग सजा पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त, SECL को कर्मचारी की पेनल्टी पर 60 दिन में पुनर्विचार का आदेश

JUSTICE RAKESH MOHAN PANDEY, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई में समान रूप से आरोपित कर्मचारियों के बीच सजा में असमानता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने SECL के एक अकाउंटेंट को दी गई एक वेतनवृद्धि रोकने की सजा पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और सहकर्मी कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोप लगभग समान थे, लेकिन दोनों को अलग-अलग प्रकार की सजा दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि समान स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ दंड के मामले में समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।

यह मामला SECL की मणिकपुर कोलियरी, कोरबा में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत सुनील शर्मा से जुड़ा है। उन्होंने विभागीय जांच के बाद उन पर लगाई गई प्रमुख दंडात्मक कार्रवाई को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने की और 21 अगस्त 2026 को आदेश पारित किया। मामला WPS No. 1132 of 2021, Sunil Sharma बनाम South Eastern Coalfields Limited एवं अन्य के रूप में दर्ज है।

बिल भुगतान में अनियमितता के आरोप पर हुई थी विभागीय जांच

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, सुनील शर्मा और एक अन्य कर्मचारी के.एस. ठाकुर दोनों SECL में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। विभाग ने ध्रुव गार्ड प्राइवेट लिमिटेड के बिलों के भुगतान और क्लियरेंस से संबंधित कुछ अनियमितताओं की शिकायत के बाद दोनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की थी।

सुनील शर्मा द्वारा 1 जून 2012 से 31 मई 2013 की अवधि से संबंधित बिलों का भुगतान क्लियर किया गया था, जबकि के.एस. ठाकुर से संबंधित बिलों की अवधि 31 दिसंबर 2010 से 31 मई 2012 तक थी। दोनों कर्मचारियों के खिलाफ SECL के स्टैंडिंग ऑर्डर की क्लॉज 26.1, 26.5 और 26.22 के तहत आरोप लगाए गए थे। शर्मा को 21 नवंबर 2014 को आरोप-पत्र जारी किया गया था, जिसका उन्होंने 25 नवंबर 2014 को जवाब दिया था।

विभागीय जांच पूरी होने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 4 फरवरी 2016 को सुनील शर्मा की एक वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव के साथ रोकने की सजा दी। वहीं, सह-आरोपित कर्मचारी के.एस. ठाकुर को 9 फरवरी 2016 को एक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा दी गई थी। दोनों दंडों के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि संचयी प्रभाव के साथ वेतनवृद्धि रोकने का असर भविष्य की वेतनवृद्धियों पर भी पड़ सकता है, जबकि बिना संचयी प्रभाव की सजा का प्रभाव उसी अवधि तक सीमित रहता है।

विभागीय अपील और रिव्यू भी खारिज हुए

सुनील शर्मा ने दंड के खिलाफ विभागीय अपील दायर की थी। उनकी पहली अपील 15 मार्च 2016 को तकनीकी आधार पर खारिज कर दी गई। इसके बाद दूसरी अपील भी 15 जून 2018 को खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने पुनर्विचार याचिका दाखिल की, जिसे 14 जुलाई 2020 को SECL के संबंधित प्राधिकारी ने खारिज कर दिया। इसके बाद शर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विक्रम शर्मा ने तर्क दिया कि उनके और सह-कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोप लगभग समान थे। ऐसे में दोनों को अलग-अलग दंड देना समानता के सिद्धांत के विपरीत है। उन्होंने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के Rajendra Yadav बनाम State of Madhya Pradesh, State of Uttar Pradesh बनाम Raj Pal Singh और Naresh Chandra Bharadwaj बनाम Bank of India के फैसलों का हवाला दिया।

SECL ने अलग-अलग जांच और नियमों का दिया हवाला

SECL की ओर से अधिवक्ता डॉ. सुदीप अग्रवाल ने याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि दोनों कर्मचारियों के खिलाफ आरोप लगभग समान होने के बावजूद उनकी विभागीय जांच अलग-अलग अनुशासनात्मक प्राधिकारियों द्वारा और अलग-अलग नियमों के तहत की गई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सुनील शर्मा के खिलाफ पारित दंडादेश को विभागीय स्तर पर अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकारियों ने बरकरार रखा था।

हाईकोर्ट ने Article 14 और समानता के सिद्धांत पर दिया जोर

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि समान स्थिति में मौजूद कर्मचारियों के बीच दंड में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने Raj Pal Singh मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस व्यवस्था का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यदि कर्मचारियों के खिलाफ आरोपों की गंभीरता समान है और उनके बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखाया गया है, तो अलग-अलग सजा देने का आधार स्पष्ट होना चाहिए।

Rajendra Yadav मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि समानता का सिद्धांत केवल निर्दोष व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। दोषी पाए गए कर्मचारी भी समान परिस्थितियों में समान व्यवहार का दावा कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, “The Doctrine of Equality applies to all who are equally placed”, यानी समान स्थिति वाले सभी व्यक्तियों पर समानता का सिद्धांत लागू होता है।

इस सिद्धांत का संवैधानिक आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 है, जो कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। हालांकि विभागीय मामलों में इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कर्मचारी को स्वतः एक जैसी सजा मिलेगी। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि इसके लिए कर्मचारियों की स्थिति, आरोपों की प्रकृति और आरोप-पत्र के बाद के आचरण में पर्याप्त समानता होना आवश्यक है।

अदालत ने दंड की मात्रा खुद तय नहीं की

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय प्राधिकारी को दंड तय करने का अधिकार सामान्यतः प्राप्त है और अदालत नियमित रूप से अनुशासनात्मक प्राधिकारी की जगह लेकर सजा तय नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और सामान्यतः अदालत तभी हस्तक्षेप करती है जब दंड अत्यधिक या न्यायिक विवेक के स्तर पर असंगत हो।

हालांकि, हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में इसे समानता के सिद्धांत से जुड़ा मामला माना। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता दंड की मात्रा को केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दे रहे थे कि वह बहुत कठोर है, बल्कि उनका मुख्य दावा यह था कि समान आरोपों वाले सह-कर्मचारी को कम प्रभाव वाली सजा दी गई थी।

SECL को 60 दिन में लेना होगा फैसला

मामले के तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को सुनील शर्मा पर भी वही दंड लगाना चाहिए था, जो के.एस. ठाकुर पर लगाया गया था, यानी एक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकना।

हालांकि कोर्ट ने सीधे अंतिम दंडादेश बदलने के बजाय मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया। हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह कोर्ट की टिप्पणियों के आधार पर उचित निर्णय ले और यह प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर पूरी करे। इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया।

फैसले का क्या है महत्व?

यह आदेश विभागीय अनुशासन और सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार के सिद्धांत के लिहाज से महत्वपूर्ण है। फैसला यह संदेश देता है कि यदि दो कर्मचारी समान परिस्थितियों में समान या लगभग समान आरोपों का सामना कर रहे हैं, तो उनके खिलाफ अलग-अलग दंड देने के लिए ठोस और स्पष्ट आधार होना चाहिए।

हालांकि, इस आदेश को इस रूप में नहीं देखा जा सकता कि समान आरोप लगने मात्र से हर कर्मचारी को अनिवार्य रूप से समान सजा मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांत के अनुसार वास्तविक समानता के लिए आरोपों की प्रकृति के साथ-साथ कर्मचारियों के बाद के आचरण और मामले की परिस्थितियों में भी पर्याप्त समानता जरूरी है। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों कर्मचारियों की स्थिति और आरोपों में पर्याप्त समानता थी और इसी आधार पर SECL को दंड पर पुनर्विचार का निर्देश दिया गया।