सीबीआई जांच की मांग पर फिलहाल फैसला नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने SIT की जांच पर निगरानी बरकरार रखते हुए समय-समय पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्र किए गए चंदे में कथित गबन, धन के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण निर्देश दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने विशेष जांच दल (SIT) को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं तथा वास्तविक रूप से जनहित में कार्य करने वाले नागरिकों की ओर से दिए गए ठोस सुझावों पर विचार किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें राम मंदिर निर्माण से संबंधित दानराशि के कथित दुरुपयोग और गबन की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जैसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराने की मांग भी की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल SIT से जांच लेकर CBI को सौंपने का आदेश नहीं दिया है। इसके बजाय अदालत ने मौजूदा जांच की निगरानी जारी रखते हुए ऐसा तंत्र बनाया है, जिसके तहत मामले से जुड़े लोग जांच के उन विशिष्ट पहलुओं की ओर SIT का ध्यान आकर्षित कर सकेंगे, जिनकी आगे जांच या गहन पड़ताल आवश्यक समझी जाती है।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता और वास्तविक रूप से जनहित में काम करने वाले अन्य व्यक्ति मामले से जुड़े अपने विशिष्ट सुझाव सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय के माध्यम से प्रस्तुत कर सकते हैं। इन सुझावों को आगे SIT तक पहुंचाया जाएगा, ताकि जांच एजेंसी कानून के अनुसार उन पर उचित विचार कर सके।
सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से जांच से संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने की मांग की गई। उनका तर्क था कि जांच में जुटाई गई सामग्री तक पहुंच मिलने से याचिकाकर्ता अदालत को यह समझने में प्रभावी सहायता कर सकेंगे कि जांच पर्याप्त और व्यापक है या नहीं।
इस मांग का सॉलिसिटर जनरल ने विरोध किया। उनकी ओर से कहा गया कि चल रही आपराधिक जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री का खुलासा करने से जांच की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और साक्ष्यों की गोपनीयता तथा उनकी उपयोगिता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच संतुलित रास्ता अपनाया। अदालत ने जांच की पूरी सामग्री पक्षकारों को उपलब्ध कराने का आदेश देने के बजाय उन्हें जांच के विशिष्ट पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित करने की अनुमति दी। इससे जांच की गोपनीयता भी बनी रहेगी और वास्तविक जनहित से जुड़े मुद्दों को जांच एजेंसी के सामने रखने का अवसर भी मिलेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि SIT उपलब्ध सामग्री और कानून के आधार पर यह तय करने के लिए स्वतंत्र होगी कि जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाना है। इसका अर्थ यह है कि न्यायालय ने जांच एजेंसी की वैधानिक भूमिका अपने हाथ में नहीं ली है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए निगरानी रखी है कि जांच निष्पक्ष, प्रभावी और कानून के अनुरूप हो।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच में किसी महत्वपूर्ण कमी या गंभीर त्रुटि का पता चलता है तो सुप्रीम कोर्ट आवश्यक हस्तक्षेप कर सकता है। दूसरी ओर, यदि SIT यह प्रदर्शित करती है कि जांच निष्पक्ष, व्यापक और कानून के अनुसार की गई है, तो अदालत अनावश्यक रूप से जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने SIT से जांच की प्रगति से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट भी तलब की है। रिपोर्ट प्रारंभिक रूप से सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि रिपोर्ट की कितनी सामग्री संबंधित पक्षों के सामने रखी जा सकती है।
अदालत का यह दृष्टिकोण न्यायिक निगरानी और जांच एजेंसी की स्वतंत्र भूमिका के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। एक ओर मंदिर निर्माण से जुड़े दान के उपयोग को लेकर उठाए गए आरोप सार्वजनिक महत्व के हैं, वहीं दूसरी ओर किसी लंबित आपराधिक जांच की संवेदनशील सामग्री को सार्वजनिक करने से जांच प्रभावित होने की आशंका भी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं में राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्र दानराशि में कथित गबन, धन के कथित डायवर्जन और अन्य वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने मौजूदा जांच की पर्याप्तता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग की है।
हालांकि, अदालत के ताजा निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को सही माना है। आदेश में किसी व्यक्ति, संस्था या राम मंदिर निर्माण से जुड़े किसी संगठन को कथित वित्तीय अनियमितता के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है। फिलहाल अदालत का आदेश पूरी तरह जांच की प्रक्रिया और उसकी निगरानी से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जांच को CBI को सौंपने के बजाय SIT की जांच की प्रगति पर निगरानी बनाए रखने का विकल्प चुना है। आने वाली स्टेटस रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उसके आधार पर अदालत यह आकलन कर सकती है कि आरोपों की पर्याप्त जांच हो चुकी है या आगे अतिरिक्त जांच अथवा अन्य न्यायिक निर्देश की आवश्यकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका जांच एजेंसी के स्थान पर स्वयं साक्ष्य जुटाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जांच निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से आगे बढ़े। अदालत का ताजा आदेश इसी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण न्यायिक निगरानी को आगे बढ़ाता है।
