रिश्वत मांग साबित न होने पर सीएमएचओ कार्यालय के लेखाकार को हाईकोर्ट से राहत

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के एक महत्वपूर्ण मामले में राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय में पदस्थ लेखाकार प्रकाश नारायण कौमार्या को बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि रिश्वत के मामलों में केवल रकम की बरामदगी पर्याप्त नहीं है, बल्कि रिश्वत की मांग का स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण होना आवश्यक है।

मामले के अनुसार, एक ग्रामीण स्वास्थ्य समन्वयक ने अपनी पत्नी के उपचार के लिए जीपीएफ से 50 हजार रुपये निकालने हेतु आवेदन किया था। आरोप था कि आवेदन स्वीकृत कराने के बदले लेखाकार ने 1,000 रुपये रिश्वत की मांग की। शिकायत मिलने पर एसीबी ने ट्रैप कार्रवाई की और आरोपी के कार्यालय से 1,000 रुपये की राशि बरामद की थी। इसके बाद विशेष न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।

अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कथित रिश्वत मांग का आधार एक टेलीफोनिक बातचीत थी, लेकिन जांच एजेंसी ने न तो कॉल डिटेल रिकॉर्ड जुटाए और न ही रिकॉर्ड की गई आवाज का वैज्ञानिक परीक्षण कराया। जांच अधिकारी ने भी स्वीकार किया कि वह यह सुनिश्चित नहीं कर सका कि रिकॉर्डिंग में वास्तव में आरोपी की ही आवाज थी।

न्यायालय ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को जीपीएफ स्वीकृति आदेश ट्रैप कार्रवाई से पहले ही प्राप्त हो चुका था, जिससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि घटना के समय कोई लंबित कार्य शेष था या नहीं। साथ ही, स्वतंत्र पंच गवाह ने भी रिश्वत के लेनदेन को प्रत्यक्ष रूप से देखने से इनकार किया।

न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने अपने निर्णय में कहा कि “रिश्वत की मांग साबित होना भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की अनिवार्य शर्त है।” न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष इस मूल तत्व को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने विशेष न्यायालय का दोषसिद्धि आदेश निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।