राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने लखनऊ स्थित अनंता रेजिडेंसीज़ परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण दिवाला विवाद में फैसला सुनाते हुए कहा है कि डेवलपमेंट एग्रीमेंट, पावर ऑफ अटॉर्नी और कंसोर्टियम एग्रीमेंट के आधार पर डेवलपर हलवासिया डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड परियोजना या उसकी बिना बिके यूनिटों पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने परियोजना के निर्माण कार्य को पूरा करने की अनुमति बरकरार रखी है।
मामला एंडीज टाउन प्लानर्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रही कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से जुड़ा है। कंपनी ने वर्ष 2014 में डीएचएफएल से 90 करोड़ रुपये का ऋण लिया था, जिसके बदले पूरी परियोजना भूमि, अनसोल्ड यूनिट्स और प्राप्तियों पर मॉर्गेज बनाया गया था। बाद में वर्ष 2018 में हलवासिया डेवलपमेंट्स के साथ परियोजना के विकास और निर्माण को लेकर समझौता किया गया।
सीआईआरपी शुरू होने के बाद रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) ने परियोजना से संबंधित दस्तावेज और नियंत्रण मांगा तथा राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण में आवेदन दायर किया। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने माना कि IBC की धारा 19(2) और 60(5) के तहत आरपी का आवेदन पूरी तरह से सुनवाई योग्य था और हलवासिया को परियोजना से जुड़ी जानकारी एवं रिकॉर्ड उपलब्ध कराने होंगे।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि डेवलपमेंट एग्रीमेंट से केवल विकास संबंधी अधिकार मिलते हैं, स्वामित्व अधिकार नहीं। साथ ही यह भी कहा कि ऋणदाताओं द्वारा बनाया गया मॉर्गेज अब भी प्रभावी है और बिना ऋणदाता की अनुमति के परियोजना पर कोई विशेष अधिकार नहीं बनाया जा सकता। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि “हलवासिया अनसोल्ड यूनिट्स को बेचने पर कोई विशेष या मालिकाना अधिकार नहीं जता सकता।”
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि परियोजना का निर्माण काफी आगे बढ़ चुका है और इसे पूरा करना घर खरीदारों तथा अन्य हितधारकों के हित में है। इसलिए हलवासिया को अनंता रेजिडेंसीज़ का निर्माण कार्य पूरा करने की अनुमति दी गई। वहीं, परियोजना को आवासीय से पूरी तरह व्यावसायिक स्वरूप में बदलने के विवाद पर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने कोई टिप्पणी करने से इनकार किया क्योंकि यह मामला फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है।
