छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऋण बकाया वसूली के लिए गिरवी रखी गई संपत्ति की नीलामी पर रोक लगाने से इनकार करते हुए उधारकर्ताओं की रिट अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले ही सारफेसी अधिनियम, 2002 के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय का उपयोग कर ऋण वसूली अधिकरण (डीआरटी) में अपील दायर कर चुके हैं, तब उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
मामला महासमुंद जिले के ओम प्रकाश डोंगरे एवं अन्य द्वारा लिए गए 6.30 लाख रुपये के ऋण से जुड़ा है। ऋण के बदले उनकी संपत्ति गिरवी रखी गई थी। भुगतान में चूक होने पर वित्तीय संस्था ने सारफेसी अधिनियम की धारा 14 के तहत कार्रवाई शुरू की और बाद में संपत्ति की नीलामी का नोटिस जारी कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनकी अपील डीआरटी में लंबित है और अधिकरण के प्रभावी रूप से कार्य नहीं करने के कारण सुनवाई नहीं हो पा रही है। उनका कहना था कि नीलामी होने पर अपील निष्प्रभावी हो जाएगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि नीलामी नोटिस में कोई स्पष्ट अवैधता नहीं दिखाई गई है और मामले में हस्तक्षेप के लिए कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि बैंक एवं वित्तीय संस्थानों की वसूली कार्यवाही में न्यायालयों को संयम बरतना चाहिए, क्योंकि बार-बार हस्तक्षेप से कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है। इसी आधार पर अदालत ने एकलपीठ के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
