बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2019 के हत्या मामले में दोषसिद्ध दो आरोपियों को बरी कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती और परिस्थितिजन्य साक्ष्य की पूरी कड़ी आरोपी के अपराध की ओर स्पष्ट रूप से संकेत करनी चाहिए।
मामला पलेश्वर निर्मलकर की हत्या से जुड़ा था, जिसका शव 26 जून 2019 को रणवाही नहर पुलिया के पास मिला था। ट्रायल कोर्ट ने कौशल उर्फ दीपक निर्मलकर और लोकेश शोरी उर्फ लोकू को आईपीसी की धारा 302/34 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और अभियोजन पक्ष अंतिम बार साथ देखे जाने का ठोस साक्ष्य भी पेश नहीं कर सका। आरोपियों के कथित मेमोरेंडम बयान और बरामदगी को लेकर गवाहों के बयानों में भी महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए गए। कोर्ट ने कहा कि बरामद वस्तुओं पर खून मिलना भी अन्य ठोस साक्ष्यों के अभाव में आरोपियों को हत्या से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस के सामने आरोपी का कबूलनामा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। धारा 27 के तहत केवल उस जानकारी का सीमित हिस्सा स्वीकार किया जा सकता है, जो किसी तथ्य की वास्तविक बरामदगी से सीधे संबंधित हो।
अदालत ने कहा कि “संदेह, चाहे कितना भी गंभीर हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” परिस्थितिजन्य साक्ष्य की कड़ी अधूरी पाए जाने पर हाईकोर्ट ने दोनों अपीलें मंजूर करते हुए दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी तथा दोनों आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
