किसी समाज की बौद्धिक प्रगति का वास्तविक आकलन केवल उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों या शोध संस्थानों की संख्या से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना आवश्यक है कि उस समाज में ज्ञान तक आम व्यक्ति की पहुँच कितनी सहज, समान और प्रभावी है। इसी संदर्भ में डॉ. एस. आर. रंगनाथन का व्यक्तित्व और उनका कार्य भारतीय पुस्तकालय आंदोलन के इतिहास में असाधारण महत्व रखता है।
12 अगस्त 1892 को जन्मे शियाली रामामृत रंगनाथन ने गणित के अध्यापक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की, लेकिन आगे चलकर उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्हें भारत में पुस्तकालय विज्ञान का जनक माना जाता है। उन्होंने पुस्तकालय को केवल पुस्तकों को सुरक्षित रखने वाला स्थान मानने के बजाय उसे ज्ञान के व्यवस्थित, सुलभ और निरंतर विकसित होते केंद्र के रूप में देखने की दृष्टि दी।
रंगनाथन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने पुस्तकालय की चर्चा केवल पुस्तकों और अलमारियों तक सीमित नहीं रखी। उनके चिंतन के केंद्र में पाठक, ज्ञान और दोनों के बीच की दूरी को कम करने की आवश्यकता थी। वर्ष 1931 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध पाँच नियम इसी सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। “पुस्तकें उपयोग के लिए हैं”, “प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक”, “प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक”, “पाठक का समय बचाएँ” और “पुस्तकालय एक बढ़ता हुआ जीव है” जैसे सिद्धांत आज भी पुस्तकालय सेवा की मूल अवधारणाओं को समझने के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं।
इन नियमों को यदि आज के डिजिटल युग के संदर्भ में देखा जाए तो इनकी प्रासंगिकता और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। आज पुस्तकालय में केवल मुद्रित पुस्तकें ही नहीं हैं, बल्कि ई-पुस्तकें, शोध-पत्र, डिजिटल अभिलेख, डेटाबेस, संस्थागत रिपॉजिटरी और विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संसाधन उपलब्ध हैं। ऐसे समय में “पाठक का समय बचाएँ” का सिद्धांत केवल किसी पुस्तक को शीघ्र खोज लेने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है कि उपयोगकर्ता को सही सूचना, सही स्रोत और विश्वसनीय सामग्री तक कम से कम समय में पहुँचाया जाए।
इसी प्रकार “पुस्तकालय एक बढ़ता हुआ जीव है” का सिद्धांत आज के पुस्तकालयों के लिए विशेष महत्व रखता है। तकनीक बदल रही है, सूचना के स्वरूप बदल रहे हैं और पाठकों की आवश्यकताएँ भी बदल रही हैं। ऐसे में पुस्तकालय यदि केवल पारंपरिक सेवाओं तक सीमित रहता है तो वह अपने मूल उद्देश्य से दूर हो सकता है। आधुनिक पुस्तकालय को डिजिटल सेवाओं, स्वचालन, नेटवर्किंग, दूरस्थ पहुँच, डिजिटल संरक्षण और सूचना साक्षरता जैसी आवश्यकताओं के साथ निरंतर विकसित होना होगा।
रंगनाथन का दूसरा महत्वपूर्ण योगदान वर्गीकरण के क्षेत्र में रहा। वर्ष 1933 में उन्होंने Colon Classification विकसित किया, जिसमें विषयों को अलग-अलग पहलुओं में विभाजित करके व्यवस्थित किया गया। इसके अंतर्गत Personality, Matter, Energy, Space और Time अर्थात PMEST जैसी अवधारणाओं का प्रयोग किया गया। यह दृष्टिकोण जटिल विषयों को अधिक लचीले और विश्लेषणात्मक तरीके से व्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
आज जब डिजिटल पुस्तकालयों, ऑनलाइन डेटाबेस और खोज प्रणालियों में विषयों को विभिन्न पहलुओं के आधार पर व्यवस्थित किया जाता है, तब रंगनाथन की वर्गीकरण संबंधी सोच को नए संदर्भ में समझना आवश्यक हो जाता है। आधुनिक सूचना संरचना भले ही अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित हो, लेकिन उसके पीछे ज्ञान को व्यवस्थित करने, खोजने और उपयोगकर्ता तक पहुँचाने की मूल समस्या वही है जिसे रंगनाथन ने लगभग एक शताब्दी पहले गंभीरता से समझा था।
रंगनाथन केवल सिद्धांतकार नहीं थे। उन्होंने पुस्तकालय शिक्षा और पेशेवर प्रशिक्षण को भी मजबूत आधार देने का प्रयास किया। मद्रास विश्वविद्यालय में पुस्तकालय विज्ञान के अध्ययन और प्रशिक्षण को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय से भी जुड़े। उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान को एक व्यवस्थित अकादमिक अनुशासन के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया।
उनकी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष सार्वजनिक पुस्तकालय आंदोलन भी था। उनका मानना था कि पुस्तकालय केवल विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ज्ञान का लोकतंत्रीकरण तभी संभव है जब समाज के प्रत्येक वर्ग को पुस्तकालय सेवाओं तक पहुँच मिले। यही विचार आगे चलकर भारत में सार्वजनिक पुस्तकालय व्यवस्था के विकास के लिए महत्वपूर्ण वैचारिक आधार बना।
आज भारत डिजिटल ज्ञान व्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है। INFLIBNET Centre जैसे संस्थान उच्च शिक्षा और शोध समुदाय को नेटवर्क आधारित सूचना संसाधनों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल संसाधनों और सूचना नेटवर्क के इस दौर में रंगनाथन का मूल दर्शन एक महत्वपूर्ण कसौटी प्रस्तुत करता है: तकनीक का अंतिम उद्देश्य उपयोगकर्ता तक ज्ञान की बेहतर पहुँच सुनिश्चित करना होना चाहिए।
रंगनाथन की विरासत केवल पाँच नियमों, वर्गीकरण पद्धति या कुछ पुस्तकों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत एक ऐसी पेशेवर दृष्टि है जिसमें पुस्तकालय का केंद्र पुस्तक नहीं, बल्कि पुस्तक और पाठक के बीच स्थापित होने वाला ज्ञान-संबंध है। उन्होंने पुस्तकालयाध्यक्ष को केवल संग्रह का संरक्षक नहीं, बल्कि ज्ञान के संगठन और प्रसार का सक्रिय माध्यम माना।
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल पुस्तकालय, बड़े डेटा, मशीन लर्निंग और स्वचालित सूचना पुनर्प्राप्ति जैसी तकनीकें पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान को नई दिशा दे रही हैं, तब रंगनाथन के विचारों को नए सिरे से पढ़ने की आवश्यकता है। तकनीक बदल सकती है, सूचना का माध्यम बदल सकता है, लेकिन ज्ञान तक विश्वसनीय और समान पहुँच की आवश्यकता समाप्त नहीं हो सकती।
यही कारण है कि डॉ. एस. आर. रंगनाथन आज केवल भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के इतिहास का एक महान नाम नहीं हैं। वे उस विचारधारा के प्रतिनिधि हैं जो पुस्तकालय को समाज की बौद्धिक चेतना का केंद्र मानती है। उनकी जन्मतिथि 12 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के रूप में स्मरण किया जाना इसी स्थायी योगदान का सम्मान है।
रंगनाथन का संदेश आज भी स्पष्ट है: पुस्तकालय तभी सार्थक है जब ज्ञान बंद अलमारियों में सुरक्षित रहने के बजाय सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुँचता है। यही विचार पारंपरिक पुस्तकालय से डिजिटल ज्ञान समाज तक उनकी सबसे बड़ी और सबसे स्थायी देन है।
संपादकीय निष्कर्ष:
डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने पुस्तकालय को केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज के ज्ञान, शिक्षा और बौद्धिक विकास का जीवंत संस्थान समझने की दृष्टि दी। आज के डिजिटल युग में उनके सिद्धांतों को नए तकनीकी संदर्भों में लागू करना ही उनके प्रति सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।
– Author : Dr. Kundan Shri Mishra (Father of Public Library Movement in Chhattisgarh State)
