छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 1970 के पारिवारिक बंटवारे को सही माना और संपत्ति विवाद की अपील खारिज कर दी।

JUSTICE NARENDRA KUMAR VYAS, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे से जुड़े करीब दो दशक पुराने विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राम निवास देवांगन की प्रथम अपील खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित होता है कि दोनों भाइयों के बीच वर्ष 1970 में ही पारिवारिक बंटवारा हो चुका था। अदालत ने यह भी माना कि अंबिकापुर स्थित विवादित संपत्ति मृतक हेम कुमार देवांगन की स्वयं अर्जित संपत्ति थी और उसे संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति मानने का पर्याप्त आधार नहीं है। यह फैसला 24 अगस्त 2026 को सुनाया गया।

मामला फर्स्ट अपील नंबर 269/2005 से संबंधित है। अपीलकर्ता राम निवास देवांगन ने रायगढ़ के फास्ट ट्रैक कोर्ट में वर्ष 2001 में दायर सिविल सूट में संपत्तियों के बंटवारे और अलग कब्जे की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने 18 नवंबर 2005 को उनका दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 के तहत प्रथम अपील दाखिल की।

विवाद रायगढ़ के पैलेस रोड स्थित मकानों और अंबिकापुर की संपत्ति से जुड़ा था। अपीलकर्ता का कहना था कि वह और उनके भाई हेम कुमार देवांगन हिंदू मिताक्षरा कानून से शासित संयुक्त हिंदू परिवार के सदस्य थे और संबंधित संपत्तियों का कभी विधिवत बंटवारा नहीं हुआ। उनका दावा था कि सभी संपत्तियों पर दोनों भाइयों का संयुक्त अधिकार और कब्जा था तथा उन्हें संपत्ति में आधा हिस्सा मिलना चाहिए।

अपीलकर्ता ने यह भी कहा था कि उनके पिता भरत राम वर्ष 1986 में तीर्थयात्रा पर गए थे और उसके बाद वापस नहीं लौटे। इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के आधार पर उन्हें मृत माना जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने पारिवारिक संपत्ति में अपने अधिकारों को आगे बढ़ाते हुए विभाजन और अलग कब्जे की मांग की थी।

दूसरी ओर, हेम कुमार देवांगन के कानूनी प्रतिनिधियों ने दावा किया कि दोनों भाइयों के बीच वर्ष 1970 में ही पिता द्वारा बंटवारा कर दिया गया था। उनके अनुसार पैलेस रोड की एक संपत्ति हेम कुमार को और दूसरी संपत्ति राम निवास को मिली थी। बंटवारे के बाद दोनों भाई अलग-अलग मकानों में रहने लगे थे और संबंधित संपत्तियों पर उनका अलग कब्जा था।

प्रतिवादियों का यह भी कहना था कि हेम कुमार वर्ष 1965 से सरकारी सेवा में थे और उन्होंने वर्ष 1982 में अपने हिस्से में आए मकान को अपने वेतन और व्यक्तिगत आय से दोबारा बनवाया था। इसलिए उस मकान पर राम निवास का संयुक्त अधिकार नहीं बनता। अंबिकापुर की संपत्ति को लेकर भी प्रतिवादियों ने कहा कि इसे हेम कुमार ने अपनी स्वयं की आय से खरीदा था और यह संयुक्त पारिवारिक संपत्ति नहीं थी।

हाईकोर्ट ने मामले में सबसे पहले इस सवाल पर विचार किया कि क्या ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही था कि दोनों भाइयों के बीच पहले ही बंटवारा हो चुका था और अंबिकापुर की अनुसूची ‘सी’ वाली संपत्ति हेम कुमार की स्वयं अर्जित संपत्ति थी। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया।

अदालत ने अपीलकर्ता की जिरह के दौरान दिए गए बयानों को विशेष महत्व दिया। रिकॉर्ड के अनुसार, अपीलकर्ता ने स्वीकार किया था कि वह अपने पिता के साथ मिट्टी के मकान में रहते थे। दूसरी ओर, अनुसूची ‘ए’ में शामिल मकान वर्ष 1982 तक बदलकर पक्का और बाद में दो मंजिला भवन बन चुका था। अपीलकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि जब उनके भाई ने वर्ष 1982 में पुराने मिट्टी के मकान को तोड़कर नया मकान बनवाया, तब उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की थी।

हाईकोर्ट ने निर्माण पर खर्च से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्य को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, रिकॉर्ड में मौजूद डायरी, जिसे मूल प्रतिवादी की लिखावट में बताया गया है, में मकान के निर्माण पर किए गए खर्च का विवरण दर्ज था। अदालत ने इस सामग्री को हेम कुमार द्वारा अपनी आय से मकान बनवाए जाने के दावे के समर्थन में माना।

इसके अलावा, हेम कुमार की पत्नी के बयान में वर्ष 1970 के बंटवारे का विवरण सामने आया। उनके अनुसार, उनके ससुर ने तीन व्यक्तियों, धर्मू, आनंद और भक्ति की मौजूदगी में दोनों भाइयों के बीच बंटवारा कराया था। दोनों भाइयों को अलग-अलग मिट्टी के मकान दिए गए और प्रत्येक को 1,000 रुपये भी दिए गए थे। हाईकोर्ट ने इस साक्ष्य को अन्य सामग्री के साथ पढ़ते हुए माना कि पारिवारिक बंटवारे की बात पर्याप्त रूप से साबित होती है।

अदालत ने कृषि भूमि के बंटवारे से जुड़े साक्ष्य को भी महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड में मौजूद गवाही से यह सामने आया कि परिवार की कृषि भूमि का भी पहले से बंटवारा हो चुका था और दोनों भाई अपने-अपने हिस्से पर अलग-अलग कब्जे और खेती कर रहे थे। हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को इस निष्कर्ष के समर्थन में माना कि परिवार में पहले ही बंटवारा हो चुका था।

संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति साबित करने की जिम्मेदारी किसकी?

हाईकोर्ट ने संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति से जुड़े दावे में प्रमाण के भार यानी Burden of Proof के सिद्धांत को भी स्पष्ट किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Shrinivas Krishnarao Kango v. Narayan Devji Kango मामले में दिए गए सिद्धांत का उल्लेख किया। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति बताकर उसमें हिस्सा मांगता है, तो प्रारंभिक तौर पर उस दावे को साबित करने की जिम्मेदारी उसी पर होती है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2026 के Dorairaj v. Doraisamy मामले का भी उल्लेख किया। इस कानूनी सिद्धांत के अनुसार, केवल किसी परिवार का संयुक्त हिंदू परिवार होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की संपत्ति भी संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है। यदि पैतृक संपत्ति और उससे होने वाली आय के आधार पर किसी बाद की संपत्ति को संयुक्त संपत्ति बताया जाता है, तो उसके लिए आवश्यक तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण होता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता अनुसूची ‘ए’ और ‘बी’ की संपत्तियों को संयुक्त हिंदू परिवार की अविभाजित संपत्ति साबित करने में अपना प्रारंभिक भार पूरा नहीं कर सके। दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से वर्ष 1970 के बंटवारे, अलग कब्जे और मकान निर्माण से संबंधित पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत की गई थी।

अंबिकापुर की संपत्ति को क्यों माना गया स्वयं अर्जित?

अनुसूची ‘सी’ में शामिल अंबिकापुर की संपत्ति को लेकर अपीलकर्ता का तर्क था कि इसे संयुक्त परिवार की संपत्ति के मूल या आय से खरीदा गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि हेम कुमार सरकारी कर्मचारी थे और संपत्ति खरीदने के लिए उनकी स्वयं की आय उपलब्ध थी। अपीलकर्ता पर्याप्त साक्ष्य के माध्यम से यह साबित नहीं कर सके कि अंबिकापुर की संपत्ति खरीदने में संयुक्त पारिवारिक संपत्ति की आय का इस्तेमाल हुआ था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में ऐसी कोई गंभीर कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं थी, जिसके आधार पर प्रथम अपीलीय अदालत को हस्तक्षेप करना आवश्यक हो। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया था।

इस मामले का कानूनी महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह बताता है कि हिंदू संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सा मांगने वाले व्यक्ति को केवल पारिवारिक संबंध या संयुक्त परिवार के अस्तित्व के आधार पर अधिकार नहीं मिल जाता। संपत्ति की संयुक्त प्रकृति, परिवार की आर्थिक स्थिति, पैतृक संपत्ति से प्राप्त आय, पहले हुए बंटवारे और संपत्ति खरीदने के स्रोत जैसे तथ्यों को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना पड़ सकता है।

फैसले में जिरह के दौरान दिए गए स्वीकारोक्तिपूर्ण बयानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। अपीलकर्ता द्वारा मकान के निर्माण पर आपत्ति नहीं किए जाने और परिवार की कृषि भूमि के पहले से बंटे होने से संबंधित साक्ष्यों ने प्रतिवादियों के पक्ष को मजबूत किया।

अंततः न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने प्रथम अपील को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें वर्ष 1970 के पारिवारिक बंटवारे को स्वीकार किया गया था और अंबिकापुर की संपत्ति को हेम कुमार देवांगन की स्वयं अर्जित संपत्ति माना गया था। अदालत ने आदेश दिया कि इसके अनुसार डिक्री तैयार की जाए।