नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026: भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के विधिक समुदाय, विशेष रूप से युवा वकीलों से संविधान की मूल भावना को आगे बढ़ाने और प्रत्येक नागरिक के लिए न्याय को सुलभ बनाने की जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया।
सुप्रीम कोर्ट परिसर के लॉन में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह दिन उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन, श्रम और सपने समर्पित किए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और विधि के बीच गहरे और ऐतिहासिक संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दोनों महान व्यक्तित्व विधि व्यवसाय से जुड़े थे। उन्होंने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में विधिक समुदाय केवल दर्शक नहीं था, बल्कि उसने इस ऐतिहासिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद कानून की भूमिका और उसके उद्देश्य की समझ में महत्वपूर्ण बदलाव आया। कानून का वास्तविक उद्देश्य केवल आदेश देना या व्यवस्था को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि न्याय की स्थापना करना, स्वतंत्रता की रक्षा करना और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखना है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने चुनौती औपनिवेशिक सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि संविधान में परिकल्पित स्वतंत्र भारत के दृष्टिकोण को वास्तविक जीवन में लागू करना था।
न्याय तक समान पहुंच पर जोर
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने न्याय तक पहुंच के महत्व पर विशेष जोर देते हुए विधिक सहायता व्यवस्था और विधिक सेवा प्राधिकरणों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विधिक सहायता ने यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है कि न्याय केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए उपलब्ध हो।
उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच कुछ लोगों के लिए विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सभी के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धता है। मुख्य न्यायाधीश ने विधिक समुदाय की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ वकीलों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया है।
उन्होंने कहा कि आज विधिक पेशे की जिम्मेदारी संविधान के वादे को जीवित रखना है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिनके पास न्याय प्राप्त करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन या अपनी बात रखने का प्रभावी माध्यम नहीं है।
युवा वकीलों पर बड़ी जिम्मेदारी
युवा वकीलों को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने नई पीढ़ी के प्रति विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी समानता, समावेशन और न्याय तक पहुंच जैसे मूल्यों के प्रति संवेदनशील है, जो न्याय व्यवस्था के भविष्य के लिए आश्वस्त करने वाला संकेत है।
उन्होंने युवा वकीलों से कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से विधिक समुदाय ने जिस जिम्मेदारी को निभाया है, वह जल्द ही उनके कंधों पर आने वाली है। पिछली पीढ़ियों ने न्याय की जिन संस्थाओं का निर्माण और सुदृढ़ीकरण किया है, उनकी रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना अब युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा कि संविधान की दृष्टि को वास्तविक रूप देने की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है और आने वाली दूरी युवा विधिक पेशेवरों को तय करनी है।
समारोह के समापन पर मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को स्वतंत्रता दिवस के इस महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अवसर पर कार्यक्रम आयोजित करने के लिए धन्यवाद दिया। उनका संबोधन विधिक समुदाय को यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल अधिकारों का उपभोग नहीं, बल्कि न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना भी है।
