भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि न्याय केवल एक दूर का वादा नहीं होना चाहिए, बल्कि संवाद, गरिमा और समावेशन पर आधारित ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जो प्रत्येक व्यक्ति तक प्रतिदिन पहुंच सके। उन्होंने कहा कि विधिक सहायता का वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक न्याय पाने के लिए संस्थानों तक पहुंचने को मजबूर न हों, बल्कि न्याय स्वयं नागरिक तक पहुंचे।
मुख्य न्यायाधीश इंदौर में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सहयोग से आयोजित पश्चिम क्षेत्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। दो दिवसीय सम्मेलन का विषय “न्याय तक पहुंच बढ़ाना: एकजुट आवाज, मजबूत कल” रखा गया है। सम्मेलन में न्यायाधीशों, न्यायिक अधिकारियों, विधिक सहायता अधिवक्ताओं और पैरा-लीगल स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सम्मेलन की विषयवस्तु में शामिल तीनों शब्द केवल बैनर के लिए नारे नहीं हैं, बल्कि प्रभावी विधिक सहायता की कार्यप्रणाली की मूल अवधारणा हैं। उनके अनुसार विधिक सहायता ऐसी होनी चाहिए, जिसमें लोगों से संवाद किया जाए, केवल उन्हें संबोधित न किया जाए; उन्हें केवल मुकदमे की संख्या न समझकर नागरिक के रूप में सम्मान दिया जाए और जहां वे रहते हैं, वहीं तक विधिक सहायता पहुंचाई जाए।
मुख्य न्यायाधीश ने इंदौर के इतिहास का उल्लेख करते हुए लोकमाता अहिल्याबाई होलकर को याद किया। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होलकर लगभग प्रतिदिन खुला दरबार लगाकर किसानों, विधवाओं और व्यापारियों की समस्याएं सीधे सुनती थीं। उन्होंने कहा कि उनके प्रशासन की विशेषता केवल न्याय प्रदान करना नहीं थी, बल्कि न्याय को लोगों के लिए सुलभ बनाना भी थी। यही वह मानक है, जिसे वर्तमान विधिक सेवा व्यवस्था को हासिल करने का प्रयास करना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने विधिक सहायता के तीन महत्वपूर्ण आधारों संवाद, गरिमा और समावेशन की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच की शुरुआत संवाद से होती है। प्रत्येक विधिक सहायता आवेदन के पीछे किसी व्यक्ति की समस्या और उसकी कहानी होती है। इसी तरह कोई भी विधिक जागरूकता कार्यक्रम तभी प्रभावी हो सकता है, जब संस्थाएं पहले जमीनी वास्तविकताओं को समझें।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के लिए यह संवाद राष्ट्रीय स्तर से लेकर उस पैरा-लीगल स्वयंसेवक तक होना चाहिए, जो समुदाय के सबसे करीब खड़ा होता है। एकजुट आवाज का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक जैसी बात कहें, बल्कि यह है कि सभी का उद्देश्य समान हो और स्थानीय जरूरतों के अनुसार काम किया जाए।
पश्चिमी क्षेत्र की विविधता का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मध्य प्रदेश के किसी आदिवासी परिवार, गोवा के मछुआरा समुदाय, गुजरात के प्रवासी श्रमिक और मुंबई में कानूनी सहायता मांगने वाली महिला की विधिक जरूरतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। इसलिए विधिक सहायता की प्रतिक्रिया भी एक जैसी नहीं हो सकती। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विधिक सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया।
गरिमा के संबंध में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सम्मान केवल बड़े सिद्धांतों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहार में दिखाई देता है। विधिक सहायता अधिवक्ता का किसी व्यक्ति की बात धैर्यपूर्वक सुनना, स्वयंसेवक का सरल भाषा में कानून समझाना और न्यायिक अधिकारी द्वारा अदालत में शिष्टाचार सुनिश्चित करना, ये सभी गरिमा आधारित न्याय व्यवस्था के उदाहरण हैं।
उन्होंने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 कमजोर और वंचित वर्गों को सहायता को दान या कृपा के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में देखता है। संविधान का अनुच्छेद 39A समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता की दिशा में राज्य को प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने का दायित्व देता है।
समावेशन को सबसे कठिन कसौटी बताते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी संस्था की वास्तविक सफलता इस बात से तय नहीं होती कि वह उन लोगों को कितनी अच्छी सेवा देती है, जो उसके पास पहुंच सकते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वह उन लोगों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है, जो स्वयं कभी वहां नहीं पहुंच सकते।
उन्होंने विधिक सहायता के क्षेत्र में हो रही प्रगति का उल्लेख करते हुए टेली-लॉ के माध्यम से एक करोड़ से अधिक पूर्व-विवाद विधिक परामर्श दिए जाने, न्याय बंधु मंच के जरिए नि:शुल्क सेवा देने वाले अधिवक्ताओं को जरूरतमंदों से जोड़ने तथा दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों में मोबाइल विधिक सहायता क्लीनिकों की पहुंच बढ़ने की जानकारी दी।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि विधिक सेवा संस्थाओं का लक्ष्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए जिसमें “न्याय नागरिक तक पहुंचे, न कि नागरिक को हमेशा न्याय तक पहुंचने के लिए यात्रा करनी पड़े।” उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र के राज्यों से सिद्धांतों तक सीमित रहने के बजाय उन्हें व्यवहार में लागू करने के लिए ठोस कार्ययोजना, बेहतर समन्वय और प्रभावी संस्थागत ढांचा तैयार करने का आह्वान किया।
पैरा-लीगल स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 39A की भावना उनके हाथों में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विधिक सहायता का संवैधानिक वादा तभी सार्थक होगा, जब वह उस घर तक पहुंचे, जिसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।
अपने संबोधन के समापन पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मजबूत कल की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती, बल्कि उसे वर्तमान में ही मिलकर तैयार करना होगा। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपना संबोधन समाप्त किया।
