दहेज मामलों में अब ‘तारीख पर तारीख’ नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों, हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट को दिए 10 अहम निर्देश

Supreme Court of India

नई दिल्ली: दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या जैसे मामलों में लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्यों, हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी और बार-बार तारीख दिए जाने की व्यवस्था को कम किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ितों और आरोपियों दोनों को समयबद्ध न्याय मिल सके।

निर्देशों के तहत दहेज और संबंधित मामलों में जांच प्रक्रिया को तेज करने तथा आरोपपत्र समय पर दाखिल करने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों में आरोपपत्र 60 से 90 दिनों के भीतर दाखिल करने की दिशा में कदम उठाने को कहा गया है। आरोपपत्र दाखिल होने के बाद मुकदमे की कार्यवाही भी अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रहनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने लंबित मामलों की निगरानी मजबूत करने पर भी जोर दिया है। इसके लिए डिजिटल डैशबोर्ड और ऑटोमेटिक अलर्ट जैसी तकनीकी व्यवस्था का इस्तेमाल करने की बात कही गई है, ताकि पुराने मामलों की स्थिति पर नियमित नजर रखी जा सके। हाईकोर्ट को भी पुराने अपील, रिवीजन और जमानत मामलों की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं।

कोर्ट ने दहेज, बाल विवाह और महिलाओं के अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ाने तथा महिला हेल्प डेस्क और शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता बताई है। पुलिस अधिकारियों और जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने पर भी जोर दिया गया है, ताकि जांच और आरोपपत्र दाखिल करने में अनावश्यक देरी न हो।

मामले में जहां संभव हो, उपयुक्त वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता के माध्यम से समाधान की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया है। साथ ही, हर वर्ष लंबित मामलों की स्थिति की रिपोर्ट तैयार कर उनकी निगरानी करने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का मुख्य उद्देश्य दहेज और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना, अनावश्यक स्थगन को रोकना और लंबे समय से लंबित मामलों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करना है।