मुंबई। Advocates’ Association of Western India (AAWI) ने महिला अधिवक्ताओं की नेतृत्व में भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। एसोसिएशन ने अपने नियमों और संविधान में संशोधन करते हुए अध्यक्ष का पद हर तीन चुनाव में एक बार महिला सदस्य के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया है। यह व्यवस्था अगले चुनाव से प्रभावी होगी। इस फैसले के साथ AAWI भारत का पहला बार निकाय बन गया है, जिसने अध्यक्ष पद को महिलाओं के लिए नियमित रूप से आरक्षित करने का प्रावधान किया है।
यह निर्णय 21 अगस्त को आयोजित विशेष आम सभा की बैठक में लिया गया। इससे पहले 9 अगस्त को एक संवैधानिक समिति का गठन किया गया था, जिसे एसोसिएशन के कार्यकारी नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उपायों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर नियमों और संविधान में संशोधन को मंजूरी दी गई।
संशोधित Rule 3(a) के प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, अध्यक्ष का पद प्रत्येक तीसरे कार्यकाल में महिला सदस्य के लिए आरक्षित रहेगा। यानी दो लगातार कार्यकाल तक अध्यक्ष पद पर कोई आरक्षण नहीं होगा और उसके बाद तीसरे कार्यकाल में यह पद महिला सदस्य के लिए आरक्षित रहेगा। AAWI के अनुसार, 162 वर्षों के इतिहास में अब तक कोई महिला एसोसिएशन की अध्यक्ष नहीं बनी है। नए प्रावधान से इस स्थिति में बदलाव आएगा।
अध्यक्ष पद के अलावा सचिव के पद को भी महिला सदस्यों के लिए आरक्षित किया गया है। Rule 3(c) में किए गए संशोधन के तहत दो गैर-आरक्षित राष्ट्रपति कार्यकालों में से पहले कार्यकाल के दौरान सचिव का पद महिला सदस्य के लिए आरक्षित रहेगा।
एसोसिएशन ने महिलाओं के लिए उपाध्यक्ष के एक पद का मौजूदा आरक्षण भी बरकरार रखा है। यह व्यवस्था वर्ष 2018 में लागू की गई थी, जब उपाध्यक्ष का एक पद और कार्यकारी परिषद की दो सीटें महिला सदस्यों के लिए आरक्षित की गई थीं।
2026 के संशोधन के तहत AAWI की कार्यकारी परिषद की संरचना में भी बदलाव किया गया है। नियमित सदस्यों की संख्या आठ से बढ़ाकर नौ कर दी गई है और परिषद में चार महिला सदस्यों के लिए स्थान सुनिश्चित किए गए हैं। कम से कम सात वर्ष की प्रैक्टिस वाले पांच सदस्यों में से दो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। वहीं, कम से कम चार वर्ष की प्रैक्टिस की पात्रता वाली शेष चार सीटों में से दो सीटें महिला अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित की गई हैं। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप महिला अधिवक्ताओं के पास कार्यकारी परिषद की नियमित सीटों में एक-तिहाई से कुछ अधिक प्रतिनिधित्व होगा।
AAWI के अध्यक्ष प्रशांत रेलेकर ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की दिशा में दिए गए आदेश के बाद एसोसिएशन ने इस दिशा में कदम उठाया और अध्यक्ष पद के लिए ऐसा प्रावधान करने वाला पहला एसोसिएशन बना। उन्होंने यह भी कहा कि देश के इतिहास में पहली बार किसी बार एसोसिएशन का नेतृत्व एक महिला करेगी।
एसोसिएशन की उपाध्यक्ष प्राची ताटके ने बताया कि संवैधानिक समिति में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ-साथ पुरुष और महिला दोनों सदस्य शामिल थे। उनके सुझावों और सिफारिशों के आधार पर प्रस्ताव तैयार किए गए। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र हमेशा से प्रगतिशील राज्य रहा है और उन्हें उम्मीद थी कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होगा।
यदि भविष्य में अध्यक्ष पद के लिए कोई पात्र महिला उपलब्ध नहीं होती है तो ऐसी स्थिति से निपटने के सवाल पर ताटके ने कहा कि फिलहाल नियमों में इसके लिए अलग प्रावधान नहीं किया गया है। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर विशेष आम सभा की बैठक बुलाकर उचित निर्णय लिया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसी स्थिति आने से पहले महिला अधिवक्ताओं की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
AAWI की सदस्य अधिवक्ता सोनल ने इसे देश में महिला अधिवक्ताओं के लिए संभवतः सबसे व्यापक और प्रभावी आरक्षण व्यवस्था बताया। वहीं, एसोसिएशन के सचिव सुरेश साबरड ने कहा कि यह केवल नेतृत्व में बदलाव नहीं है, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व में प्रगति, समावेशिता और विश्वास को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण कदम है।
AAWI का यह संशोधन बार एसोसिएशनों में महिला अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व और नेतृत्व को लेकर चल रही व्यापक बहस के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अध्यक्ष, सचिव, उपाध्यक्ष और कार्यकारी परिषद की सीटों में आरक्षण के माध्यम से एसोसिएशन ने अपने शीर्ष निर्णय लेने वाले पदों में महिलाओं की भागीदारी के लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार किया है।
