नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के तहत ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि स्वीकृत रेजोल्यूशन प्लान के तहत समाप्त हो चुके दावे का इस्तेमाल स्वतंत्र रूप से वसूली के लिए नहीं किया जा सकता। हालांकि, कानूनी रूप से अनुमत परिस्थितियों में मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान सेट-ऑफ के माध्यम से प्रतिदावा राशि को समायोजित करने की अनुमति दी जा सकती है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि IBC की धारा 31 के तहत स्वीकृत रेजोल्यूशन प्लान संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होता है। इसका उद्देश्य सफल रेजोल्यूशन आवेदक को कंपनी के अधिग्रहण के बाद अप्रत्याशित देनदारियों से बचाना है। साथ ही, कंपनी के वैध संविदात्मक दावों को केवल दिवाला प्रक्रिया पूरी होने के आधार पर समाप्त नहीं माना जा सकता।
इस फैसले से दिवाला प्रक्रिया और मध्यस्थता से जुड़े मामलों में स्वतंत्र वसूली के दावे तथा बचाव के रूप में सेट-ऑफ के बीच अंतर स्पष्ट होता है।
