राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण का बड़ा फैसला: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) नीलामी में खरीदी गई संपत्ति पर पुराने मेंटेनेंस बकाया की वसूली नहीं कर सकती हाउसिंग सोसायटी

The Rajpatra Law

मुंबई स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत परिसमापन प्रक्रिया में नीलामी के माध्यम से संपत्ति खरीदने वाले सफल बोलीदाता को पूर्व मालिक या कॉर्पोरेट देनदार के पुराने बकाया मेंटेनेंस शुल्क, ब्याज या अन्य देनदारियों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि ऐसे दावों की वसूली केवल IBC के तहत निर्धारित प्रक्रिया और वितरण व्यवस्था के माध्यम से ही की जा सकती है।

मामला C. Mahendra Export Ltd. के परिसमापन से जुड़ा था। कंपनी को 29 जुलाई 2025 को परिसमापन में भेजा गया था और नियुक्त लिक्विडेटर ने मुंबई के पंचरत्न भवन स्थित एक फ्लैट की ई-नीलामी आयोजित की। अनिल पटेल और अन्य आवेदकों ने 3.01 करोड़ रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाकर संपत्ति खरीदी और 19 जनवरी 2026 को उनके पक्ष में विधिवत बिक्री प्रमाणपत्र (Sale Certificate) जारी किया गया।

हालांकि, संपत्ति हस्तांतरण के बाद पंचरत्न को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी ने खरीदारों को पत्र भेजकर लगभग 28.24 लाख रुपये के कथित बकाया मेंटेनेंस शुल्क और ब्याज का भुगतान करने की मांग की। सोसायटी ने यह भी शर्त रखी कि जब तक पुराने बकाया का भुगतान नहीं किया जाता, तब तक खरीदारों के नाम पर सदस्यता और शेयर प्रमाणपत्र का हस्तांतरण नहीं किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, खरीदारों से एक इंडेम्निटी डीड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, जिसमें पूर्व अवधि के सभी बकाया चुकाने की जिम्मेदारी स्वीकार करने की शर्त शामिल थी।

इन मांगों को चुनौती देते हुए सफल नीलामी खरीदारों ने NCLT का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि बिक्री प्रमाणपत्र जारी होने के बाद संपत्ति पर उनका स्वामित्व स्थापित हो चुका है और पूर्व अवधि के किसी भी बकाया के लिए उन्हें उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सोसायटी ने पहले ही कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) और बाद में परिसमापन प्रक्रिया में अपना दावा प्रस्तुत किया था। लिक्विडेटर ने सोसायटी के लगभग 25.99 लाख रुपये के दावे को “ऑपरेशनल क्रेडिटर” की श्रेणी में स्वीकार भी कर लिया था। न्यायाधिकरण ने कहा कि जब कोई लेनदार IBC के तहत दावा प्रस्तुत कर चुका है और उसका दावा स्वीकार किया जा चुका है, तब वह उसी राशि की वसूली के लिए अलग से नीलामी खरीदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता।

NCLT ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “एक बार परिसमापन प्रक्रिया के दौरान संपत्ति की बिक्री पूरी हो जाए और सफल खरीदार के पक्ष में बिक्री प्रमाणपत्र जारी हो जाए, तो बिक्री से पूर्व की अवधि से संबंधित देनदारियों को सामान्यतः नीलामी खरीदार पर नहीं थोपा जा सकता।” न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि “ऐसे सभी दावे IBC की वैधानिक व्यवस्था और धारा 53 में निर्धारित वाटरफॉल मैकेनिज्म के अनुसार ही निपटाए जाने चाहिए।”

धारा 53 IBC की सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है, जो परिसमापन से प्राप्त धनराशि के वितरण की प्राथमिकता तय करती है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि जिन दावों को परिसमापन प्रक्रिया में स्वीकार किया गया है, उनका भुगतान इसी वैधानिक क्रम के अनुसार होगा। यदि किसी दावे का निपटारा नहीं हो पाता, तो वह दावा समाप्त माना जा सकता है और उसकी वसूली बाद में किसी तीसरे पक्ष या नीलामी खरीदार से नहीं की जा सकती।

अंततः NCLT ने सोसायटी को निर्देश दिया कि वह केवल पुराने बकाया के आधार पर फ्लैट, सदस्यता या शेयर प्रमाणपत्र के हस्तांतरण में कोई बाधा उत्पन्न न करे। हालांकि, खरीदारों को हस्तांतरण से संबंधित नियमित प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं और वैध शुल्कों का पालन करना होगा। साथ ही, लिक्विडेटर को सोसायटी के दावे पर कानून के अनुसार कार्रवाई कर उसकी स्थिति से अवगत कराने का निर्देश भी दिया गया।

यह फैसला IBC के तहत संपत्ति खरीदने वाले निवेशकों और नीलामी खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण राहत लेकर आया है। आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि परिसमापन प्रक्रिया में खरीदी गई संपत्ति पर पूर्व मालिक के बकाया का बोझ नहीं डाला जा सकता और लेनदारों को अपने दावों के लिए केवल IBC की वैधानिक व्यवस्था का ही पालन करना होगा। इससे भविष्य में परिसमापन नीलामियों में भाग लेने वाले खरीदारों का विश्वास और मजबूत होने की संभावना है।