उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जालंधर ने एक रेस्टोरेंट द्वारा ग्राहक की स्पष्ट सहमति के बिना सर्विस चार्ज वसूलने को अनुचित व्यापार प्रथा करार दिया है। आयोग ने रेस्टोरेंट को वसूला गया सर्विस चार्ज लौटाने और मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
मामला जालंधर के अधिवक्ता संजीव दुग्गल द्वारा दायर उपभोक्ता शिकायत से जुड़ा था। शिकायत के अनुसार, 8 नवंबर 2023 को वह अपने परिवार के साथ रेस्टोरेंट में बुफे डिनर के लिए गए थे। उन्होंने रेस्टोरेंट कर्मचारियों को स्पष्ट रूप से बताया था कि उनके साथ तीन वयस्क और एक नाबालिग बच्ची है, लेकिन रेस्टोरेंट ने चार वयस्कों के हिसाब से शुल्क वसूल लिया। इसके अलावा भोजन और शराब के बिल में 3 प्रतिशत की दर से कुल 151.53 रुपये सर्विस चार्ज भी जोड़ दिया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि जब उन्होंने सर्विस चार्ज और नाबालिग बच्ची के लिए वसूले गए शुल्क पर आपत्ति जताई तो रेस्टोरेंट के कर्मचारियों ने उनकी शिकायत का समाधान करने के बजाय अनुचित व्यवहार किया। उन्होंने कुछ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया और इसे सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापार प्रथा बताया।
वहीं, रेस्टोरेंट प्रबंधन ने सभी आरोपों का खंडन किया। उसका कहना था कि वसूली गई राशि “स्टाफ कंट्रीब्यूशन” थी, जिसका उल्लेख मेन्यू कार्ड में किया गया था। प्रबंधन ने यह भी दावा किया कि यदि कोई ग्राहक आपत्ति करता है तो ऐसी राशि माफ कर दी जाती है। हालांकि उसने विवादित 151.53 रुपये लौटाने की इच्छा भी जताई।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि रेस्टोरेंट ने स्वयं स्वीकार किया है कि उक्त राशि ग्राहकों से वसूली गई थी। आयोग ने यह भी देखा कि बिलों में राशि को स्पष्ट रूप से “सर्विस चार्ज” के रूप में दर्शाया गया था, न कि “स्टाफ कंट्रीब्यूशन” के रूप में।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि रेस्टोरेंट यह साबित नहीं कर सका कि ग्राहक को पहले से स्पष्ट और असंदिग्ध तरीके से यह जानकारी दी गई थी कि बिल में अनिवार्य रूप से सर्विस चार्ज या स्टाफ कंट्रीब्यूशन जोड़ा जाएगा। साथ ही ऐसा कोई साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि ग्राहक ने इस अतिरिक्त शुल्क के भुगतान के लिए सहमति दी थी।
आयोग ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “उपभोक्ता की सहमति प्राप्त किए बिना सर्विस चार्ज वसूलना अनुचित व्यापार प्रथा है।” आयोग ने माना कि इस प्रकार की वसूली उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है और शिकायतकर्ता को राहत मिलने की पात्रता है।
हालांकि आयोग ने शिकायतकर्ता के अन्य आरोपों, जैसे कर्मचारियों द्वारा दुर्व्यवहार, धमकी, भोजन की खराब गुणवत्ता तथा नाबालिग बच्ची के लिए गलत शुल्क वसूले जाने के दावों को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह, लिखित शिकायत या अन्य विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता आयोग की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और ऐसे विवादित तथ्यों को सिद्ध करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं। केवल आरोप लगाने मात्र से उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता।
अंततः आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए रेस्टोरेंट को 151.53 रुपये सर्विस चार्ज की राशि शिकायत दायर करने की तिथि से भुगतान तक ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त मानसिक तनाव, उत्पीड़न और वाद व्यय के लिए 15,000 रुपये का मुआवजा भी देने का निर्देश दिया गया। आयोग ने आदेश की प्रति प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर अनुपालन करने को कहा है।
यह फैसला उन उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो रेस्टोरेंट और होटल बिलों में जोड़े जाने वाले अनिवार्य सर्विस चार्ज को लेकर लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। आदेश से स्पष्ट संकेत मिलता है कि किसी भी अतिरिक्त शुल्क की वसूली उपभोक्ता की जानकारी और सहमति के बिना नहीं की जा सकती।
