रिश्ता खत्म करने से नाराज़ युवक ने इंजीनियरिंग छात्रा की कक्षा में की हत्या, मद्रास हाईकोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी

Judgement and Order

मद्रास हाईकोर्ट ने उस युवक की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है, जिसने संबंध जारी रखने से इनकार करने पर एक इंजीनियरिंग छात्रा की उसकी कक्षा में घुसकर हत्या कर दी थी।

न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने उदयकुमार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। उदयकुमार को करूर की एक अदालत ने करूर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की तृतीय वर्ष की सिविल इंजीनियरिंग छात्रा सोनाली की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला समाज में बढ़ती उस चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें कुछ पुरुष रिश्तों में अस्वीकृति मिलने पर हिंसक रास्ता अपनाते हैं। अदालत ने कहा कि आरोपी पीड़िता के उससे दूरी बनाने के फैसले को स्वीकार नहीं कर सका और इसी कारण उसने यह जघन्य अपराध किया। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कुछ लोग यह मान बैठते हैं कि महिलाएं उनकी इच्छा के विरुद्ध भी रिश्ते को जारी रखने के लिए बाध्य हैं और इनकार मिलने पर वे हिंसा का सहारा लेते हैं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोनाली और आरोपी पहले करीबी रिश्ते में थे। हालांकि बाद में सोनाली ने उससे दूरी बना ली, जिससे आरोपी नाराज़ हो गया। 30 अगस्त 2016 को सुबह करीब 10:30 बजे वह कॉलेज की कक्षा में घुसा और कथित तौर पर लकड़ी के लट्ठे से सोनाली के सिर पर कई वार किए। बीच-बचाव करने पहुंचे एक सहायक प्रोफेसर पर भी उसने हमला किया।

गंभीर रूप से घायल सोनाली को मदुरै के अपोलो अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 449, 294(बी), 324, 302 और 506(II) के तहत दोषी ठहराते हुए हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने जांच में हुई कुछ खामियों पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि अभियोजन ने दावा किया था कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद हत्या में इस्तेमाल हथियार झाड़ियों से बरामद किया गया, जबकि गवाहों ने बताया था कि हथियार कक्षा के अंदर ही छोड़ दिया गया था। कोर्ट ने माना कि जांच अधिकारी ने बिना पर्याप्त आधार के बरामदगी का एक सिद्धांत जोड़ दिया था, जो रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।

इसके बावजूद अदालत ने कहा कि जांच में हुई यह चूक अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करती। कोर्ट ने घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को विश्वसनीय माना, जिसे चिकित्सीय साक्ष्यों और अन्य रिकॉर्ड से समर्थन मिला।

खंडपीठ ने उन छात्रों पर भी निराशा व्यक्त की, जिन्होंने कथित तौर पर घटना देखी थी लेकिन बाद में मुकदमे के दौरान अपने बयान से मुकर गए। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर आक्रोश व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि लोग न्यायिक प्रक्रिया में सच का साथ देने के लिए आगे न आएं।

अदालत ने कहा कि इन छात्रों ने न केवल मृतका को निराश किया, बल्कि सच का समर्थन करने के अपने कर्तव्य का भी पालन नहीं किया। अंततः कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे अपना मामला साबित कर दिया है और इसी आधार पर आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।