आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) की दिल्ली पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि किसी निवेशक ने अपने आयकर रिटर्न में अपेक्षाकृत कम आय दिखाई है, उसकी निवेश क्षमता या साख (Creditworthiness) पर संदेह नहीं किया जा सकता। अधिकरण ने एएनआर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में फैसला देते हुए आयकर विभाग द्वारा की गई ₹3 करोड़ की जोड़तोड़ को रद्द कर दिया।
मामला आकलन वर्ष 2017-18 से संबंधित है। कंपनी ने अपने शेयर जारी कर तीन निवेशकों से ₹1 करोड़ शेयर पूंजी और ₹2 करोड़ शेयर प्रीमियम प्राप्त किया था। जांच के दौरान आकलन अधिकारी (AO) ने पाया कि निवेश करने वाले व्यक्तियों और संस्था की घोषित आय निवेश राशि के अनुपात में कम थी। इसी आधार पर AO ने पूरी ₹3 करोड़ की राशि को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 68 के तहत “अस्पष्टीकृत नकद जमा” मानते हुए कंपनी की आय में जोड़ दिया।
कंपनी ने इस आदेश को आयुक्त (अपील) [CIT(A)] के समक्ष चुनौती दी। अपील के दौरान कंपनी ने निवेशकों की बैलेंस शीट, बैंक स्टेटमेंट, आयकर रिटर्न और अन्य वित्तीय दस्तावेज प्रस्तुत किए। इन दस्तावेजों से यह साबित हुआ कि निवेशकों के पास निवेश करने के लिए पर्याप्त नेटवर्थ और वित्तीय संसाधन उपलब्ध थे।
CIT(A) ने पाया कि आकलन अधिकारी ने केवल एक वर्ष की आय देखकर निवेशकों की साख पर सवाल उठाया, जबकि उनकी कुल संपत्ति और वित्तीय स्थिति का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया। अपीलीय प्राधिकारी ने यह भी माना कि निवेशकों की पहचान और लेनदेन की वास्तविकता पर विभाग ने कोई संदेह नहीं जताया था। इसलिए ₹3 करोड़ की जोड़तोड़ को हटाते हुए कंपनी को राहत दी गई।
राजस्व विभाग इस आदेश के खिलाफ ITAT पहुंचा। विभाग का तर्क था कि कंपनी निवेशकों के धन के स्रोत को संतोषजनक रूप से साबित नहीं कर सकी। हालांकि, अधिकरण ने कहा कि संबंधित आकलन वर्ष में कंपनी पर “स्रोत के स्रोत” (Source of Source) को साबित करने का वैधानिक दायित्व नहीं था। यदि विभाग को निवेशकों के धन के स्रोत पर संदेह था, तो वह निवेशकों के खिलाफ अलग से जांच कर सकता था।
न्यायिक सदस्य राज कुमार चौहान और लेखा सदस्य रेनू जौहरी की पीठ ने कहा कि कंपनी ने निवेशकों की पहचान, उनकी वित्तीय क्षमता और लेनदेन की वास्तविकता को पर्याप्त दस्तावेजों के माध्यम से साबित कर दिया है। अधिकरण ने दिल्ली उच्च न्यायालय के कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि “सिर्फ कम आय दिखाने के आधार पर निवेशकों की साख को खारिज नहीं किया जा सकता।”
फैसले में यह भी कहा गया कि कर अधिकारियों को केवल आयकर रिटर्न में दिखाई गई आय पर निर्भर रहने के बजाय निवेशकों की कुल वित्तीय स्थिति, नेटवर्थ और बैंकिंग रिकॉर्ड का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। पर्याप्त जांच किए बिना केवल अनुमान के आधार पर धारा 68 के तहत जोड़तोड़ करना कानूनन उचित नहीं है।
यह फैसला उन कंपनियों और निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो शेयर पूंजी और शेयर प्रीमियम से जुड़े कर विवादों का सामना कर रहे हैं। निर्णय से यह संदेश भी जाता है कि कर विभाग को किसी निवेश को संदिग्ध मानने से पहले ठोस जांच और साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना होगा, केवल कम घोषित आय को आधार बनाकर नहीं।
